Sunday, 22 October 2017

ना जाने कहाँ ले जाएँ हवाएं.. हवाएं … हवाएं..!/स्मिता मिश्र


गुड आफ्टरनून मैम, नमस्ते मैम, ससरियाकाल मैम,हाय मैम !कॉलेज के गलियारे से गुजरते हुए विविध भाषाओँ में अभिवादन स्वीकार करती हुई क्लासरूम की और जा रही हूँ I सिनेमा स्टडीज का पीरियड है I
शुक्रवार के दिन  इसी क्लास के साथ लगातार दो पीरियड होते है तो प्रैक्टिकल भी कराने का दिन होता हैI वैसे भी शुक्रवार बॉक्स-ऑफिस पर नई फिल्म आने का दिन होता है और हमारा सिनेमा पर नया टॉपिक देखने का I आज फिल्म रिव्यु का टॉपिक पढ़ना है I सिलेबस वाली फ़िल्में तो दिखाती ही हूँ ,पर साथ में नई फिल्मों के भी कुछ दृश्यों या गानों पर चर्चा होती है I नई फिल्मों से विद्यार्थी  ज्यादा कनेक्ट होते है,इसलिए उन्हीं का सन्दर्भ लेती हूँ I
विद्यार्थियों से पूछा कि आपने कौन सी नई फिल्म देखी --- ज्यादातर का जवाब था – जब हैरी मेट सेजल .
अच्छा-अच्छा ! शाहरुख साब की! ठीक है .youtube पर देखे इसका कौन सा गाना अवेलेबल है.you tube पर जो गाना उपलब्ध था ---
तुझको मैं रख लू वहां  जहाँ पर है मेरा यकीन / जो मैं तेरा न हुआ तो किसी का नहीं
बेगानी है हवाएं..हवाएं हवाएं / ना जाने कहाँ ले जाएँ हवाएं..हवाएं हवाएं !न तुझको पता न मुझको किधर
बहुत ही सुरीला गीतI सुरीले से ज्यादा मेरे लिए नोस्टेलजिक !
शाहरुख़ साब वर्सटाइल एक्टर तो नहीं है पर जो भाव अमूमन वे अपने चेहरे पर लाते हैं,उसमें उन्हें महारथ हासिल है I  Intense प्रेम के तो वे निस्संदेह बादशाह हैं Iअपनी फिल्मों में वे अपने प्रेम को लेकर जितने intense होते हैं,,वह किसी भी लड़की को आकर्षित करने के लिए काफी हैं Iमुझे यह कहने में संकोच हो रहा है ,फिर भी यह सच है कि मेरे मन में भी प्रेम को लेकर जो संकल्पना रही है ,वह शाहरुख़ जैसे चरित्र पर ही जाकर ठहरती रही Iलेकिन यह भी सच है कि उनकी दो चार फ़िल्में ही मुझे अच्छी लगी I चक दे इंडिया ,दिल तो पागल है स्वदेश और ऑफकोर्स .. दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे I intense प्रेमी और सेंसिबल पुरुष दोनों ही रूपों का गज़ब कॉम्बिनेशन है,जो अमूमन आजकल दिखाई नहीं पडता है (क्षमाप्रार्थी हूँ यदि किसी के दिल पर बात लग गयी हो J)
 ‘विचित्र किन्तु सत्य’ शाहरूख साब  और मैं एक धारावाहिक में साथ काम करते करते रह गए Iअरे रे अभिनय नहीं ,,अपन का काम तो कलम-नवीसी का ही तब भी था,आज भी है I शाहरूख साब  को फौजी सर्कस जैसे धारावाहिकों से यश मिल रहा था Iतब मेरे बड़े भाई हेमंत मिश्र जीवित थे I हेमंत भाई दूरदर्शन और रंगमंच पर काफी ख्याति प्राप्त अभिनेता थे Iउन्ही की प्रेरणा से खेल को केंद्र में रखकर एक धारावाहिक की योजना बन रही थी,जिसकी स्क्रिप्ट मैं लिख रही थी Iमैं बास्केट बॉल की खिलाडी रही तो केंद्र में मैंने बास्केट बॉल को ही रखा i खेल जीवन के तमाम उतार-चढ़ावों को केंद्र में रखकर स्क्रिप्ट लिख रही थी I शाहरूख साब   ने कर्नल कपूर के निर्देशन में ही फौजी में काम किया था और हेमंत भाई ने भी कर्नल कपूर के साथ काम किया था .,इसलिए जब धारावाहिक के लिए मुख्य खिलाडी के किरदार की बात आई तो सबने शाहरूख साब का ही नाम लिया Iहम पैर जिम्मेदारी डाली गयी शाहरूख साब   से स्क्रिप्ट सम्बन्धी बात करने के लिए I
इन दिनों लैंडलाइन फ़ोन होते थे Iमैंने उन्हें फ़ोन किया ,उधर से आवाज़ आई- हेल्लो! शाहरूख साब थेI हेमंत भाई का रिफरेन्स देकर बात शुरू की Iउन्होंने अच्छा खासा इंटरेस्ट दिखाया स्पोर्ट्स सीरियल के नाम परI पर जब उन्हें पता चला कि खेल बास्केटबॉल है तो वे बोले- मैं तो फुटबाल का खिलाडी हूँ  ,बास्केटबॉल तो मुझे आती नहींIमैंने उनसे छूटते ही पूछा-फौजी सीरियल से पहले बन्दूक चलायी थी ? मेरी बात सुनकर वो हँस पड़े और कहा –गुड पॉइंट I आप स्क्रिप्ट कब सुनाएंगी? मैं अभी सर्कस की शूटिंग में बैंगलोर जा रहा हूँ ,वापिस आकर आपको फ़ोन करता हूँ Iआप अपना नंबर दे दीजिये I मुझे अपना नंबर देने में थोड़ी झिझक हुई,मैंने कहा कि अगले महीने मैं खुद आपको फ़ोन कर लूंगी I शाहरूख साब बहुत ज़हीन हैं ,तुरंत समझ गए कि फ़ोन देने में मुझे हिचक है तो मुकुराती आवाज़ में  बोले ठीक है! अगले महीने मिलते हैंI
अगला महीना कभी नहीं आया I शाहरूख साब एक्टिंग के ही नहीं किस्मत के भी बादशाह निकले Iकुछ दिन बाद ही उन्हें दिल आशना है ,चमत्कार और  दीवाना जैसी सुपर हिट फिल्मे मिल गयी Iवे इतने बड़े हो गए कि टीवी का स्क्रीन उनके लिए बहुत छोटा रहा गया Iपर यह ज़रूर है की उन्होंने बास्केट बॉल खेला ,टीवी पर ना सही ‘कुछ-कुछ होता है’ फिल्म में ही सही I
क्लास में स्टूडेंट्स ने youtube से हैरी मेट सेजल का गीत डाउनलोड कर गाना चला दिया था जिसके कारण मैं स्मृतियों को झटक कर वर्तमान में आ गयी थी I शाहरुख़ और अनुष्का यात्रा में है और यह गाना उन दोनों की भीतर की यात्रा भी दर्शा रहा था जिसमें वे दोनों अब टूरिस्ट और गाइड  न रहकर सहयात्री हो गए थे I
सच में मंजिलों से ज्यादा यात्रायें ज्यादा मोहक होती हैं Iगीत बहुत खूबसूरत फिल्माया गया था -प्राग की धुंधलाती शाम.. किसी का साथ-साथ चलना..कहना कुछ नहीं ,पर महसूस बहुत कुछ करना I एक दूसरे को चोरी से देखना ,नज़रें मिलने पर इधर-उधर देखने लग जाना Iमुझे भी कुछ ऐसी ही शामों की याद दिला रही थीI अनजाने रास्तों को ढूँढना ,और खूब चलते जाना, चायपीने के लिए जिद करना और न मिलने पर झूठ-मूठ का नाराज़ होना I पर सबमें आनंद था,इतना आनंद कि आज भी याद करके भीतर कुछ अच्छा सा महसूस होने लगता है I
यह सच है कि जीवन की यात्रा में कितने लोग मिलते हैं पर वक़्त की हवाएं न जाने किन अनजान रास्तों पर ले जाती हैIऔर एक समय पर किये गए मज़बूत वायदे हवा के एक अनजान झोंके से कागज़ की तरह उड़ जाते हैं I पर यह ज़रूर है कि वे तमाम स्मृतियाँ मन में ही कही अँधेरे में होती हैं और ज़रा सी रौशनी मिलने पर फिर से टिमटिमाने लगती हैं ....कहीं आनंद बनकर तो कभी टीस बनकर !
बेगानी है हवाएं..हवाएं हवाएं / ना जाने कहाँ ले जाएँ हवाएं..हवाएं हवाएं !


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