गोवा एयरपोर्ट से उतर कर कार में बैठी हूँ । फरवरी में दिल्ली की भारी ठंड और घने कोहरे के कारण फ्लाइट की लेट लतीफी से जूझ कर डबलिन एयरपोर्ट से केनकून जा रही हूं। वहीँ ‘अगोंडा बीच’ पर सैंडी फीट रिसोर्ट में बुकिंग है।
डबलिन एयरपोर्ट से लगभग 70 किमी दूर है यह जगह। कोस्टल लाइन है यह। बेहद खूबसूरत। घने नारियल और काजू के पेड़ों से लबालब रास्ता। और साथ में हहराता समुद्र। अनायास गुनगुना उठी.....
समन्दर.. समन्दर.. यहां से वहां तक/ ये मौजों की चादर बिछी आसमां तक..
यार! ये भी कैसा शहर है। खामोश.. केवल प्रकृति ही बात करती है। समन्दर बात करता है। नारियल और काजू के पेड़ आपस में बात करते हैं। ठंडी हवाएं समुद्र की लहरों से हिल-मिल कर बात करती हैं। अद्भूत सौंदर्य बाहर का सौंदर्य जितना है उससे ज्यादा उस सौंदर्य को अपने में समाते जाना, उसे अपने में पीते जाना।
डबलिन एयरपोर्ट से लगभग 70 किमी दूर है यह जगह। कोस्टल लाइन है यह। बेहद खूबसूरत। घने नारियल और काजू के पेड़ों से लबालब रास्ता। और साथ में हहराता समुद्र। अनायास गुनगुना उठी.....
समन्दर.. समन्दर.. यहां से वहां तक/ ये मौजों की चादर बिछी आसमां तक..
यार! ये भी कैसा शहर है। खामोश.. केवल प्रकृति ही बात करती है। समन्दर बात करता है। नारियल और काजू के पेड़ आपस में बात करते हैं। ठंडी हवाएं समुद्र की लहरों से हिल-मिल कर बात करती हैं। अद्भूत सौंदर्य बाहर का सौंदर्य जितना है उससे ज्यादा उस सौंदर्य को अपने में समाते जाना, उसे अपने में पीते जाना।
गोवा का भूगोल उत्तरी गोवा और दक्षिणी गोवा में बंटा हुआ है। । इन दोनों गोवा के बीच तकरीबन 60-70 कि.मी. की दूरी है। गोवा की राजधानी पंजिम उत्तरी गोवा में होने के कारण तमाम हलचले उत्तरी गोवा में अधिक रहती हैं। भारतीय पर्यटक उत्तरी गोवा में अधिक जाते हैं जबकि भीड़-भाड़ और कोलाहल से दूर शांति तलाश करने वाले दक्षिणी गोवा जाते हैं।
फिलहाल मैं दक्षिणी गोवा जा रही थी जोकि एअरपोर्ट से 70 किलोमीटर दूर हैI कार आगे बढती जा रही थी और मैं स्मृतियों में पीछे I पिछले दिनों दिल्ली में भारी दिनचर्या के कारण मन बहुत थका- थका सा चल रहा था I इसलिए जब गोवा में अंतरराष्ट्रीय फिल्म सेमिनार में शिरकत की बात आई तो लगा कि मेरे लिए यह ब्रेक हो सकता है। इसलिए कर ली तैयारी ‘गोवा’ की।
फिलहाल मैं दक्षिणी गोवा जा रही थी जोकि एअरपोर्ट से 70 किलोमीटर दूर हैI कार आगे बढती जा रही थी और मैं स्मृतियों में पीछे I पिछले दिनों दिल्ली में भारी दिनचर्या के कारण मन बहुत थका- थका सा चल रहा था I इसलिए जब गोवा में अंतरराष्ट्रीय फिल्म सेमिनार में शिरकत की बात आई तो लगा कि मेरे लिए यह ब्रेक हो सकता है। इसलिए कर ली तैयारी ‘गोवा’ की।
गोवा सुनते ही एक ऐसे शहर का एहसास होता है जो प्रेम या तथाकथित प्रेम के खुलेपन के लिए जाना जाता है I मौज-मस्ती, खुलापन, समुद्र के बीच, अंग्रेज, चर्च और फेणी ऐसे ही कुछ शब्द अमूमन गोवा को परिभाषित करने के लिए प्रयोग होते हैं। इसलिये जितने लोगों को भी मेरे गोवा जाने का पता चला ,वे बहुत सांकेतिक हँसी हँसते और आँखे तिरछी करके पूछते ---ओहो ! किसके साथ जा रही हो ? जब उन्हें पता चलता कि मैं अकेले ही जा रही हूँ तो बोलते –चल झूठी ! गोवा भी कोई अकेले जाने की जगह है।
कुछ आत्मीय ऐसे हैं जिन्हें मेरे स्वभाव का कुछ-कुछ अंदाज़ा तो है, पर मैं इतनी पागल हूँ ,ये उनके लिए भी थोडा पचाना कठिन हो गयाI हैरानी से मुँह खोलकर मुझे देखा और फिर पूछा –क्या वाकई अकेले जा रही हो ! मैंने सहमति में सिर हिलाकर कहा- सेमिनार है न ! अच्छा—अच्छा ! फिर तो सेमिनार की जगह ठहरोगी .मैंने कहा –नहीं! दो दिन तो समुद्र तट पर ही बम्बू -हट बुक की है I आगे का फिर वहां पहुँच कर देखूँगी I
‘हे भगवान् !क्या विचित्र प्राणी हो तुम भी ! सरकार को टाइगर नहीं, तुम्हे संरक्षित करने की कोशिश करनी चाहिए I वे तो फिर भी 1400 हैं ,पर तुम तो बस इकलौती ही बची हो !
‘हे भगवान् !क्या विचित्र प्राणी हो तुम भी ! सरकार को टाइगर नहीं, तुम्हे संरक्षित करने की कोशिश करनी चाहिए I वे तो फिर भी 1400 हैं ,पर तुम तो बस इकलौती ही बची हो !
सब हँसते तो उनकी हँसी के साथ मैं भी हँस देती I पर यह सच है कि मैं स्टीरियोटाइप कभी नहीं रही। न कभी प्रचलित आइडियोलॉजी के चक्कर में पड़ी न कभी प्रचलित फैशन के । अपने ढंग से, अपनी ही धुन से अपनी जिंदगी को जाना और जिया है। मन में कोई लाग लपेट नहीं रखी,जो सहज लगा वही किया। जो लोग सहज प्रेम से मिले,उनसे जुड़ गयी I खैर. तमाम हास-परिहास और कौतुक को परे छोड़ अपने प्रेजेंटेशन पर ध्यान दिया क्योंकि विषय मेरे माकूल था- Gender & Hindi Cinema.
यादों का सिलसिला ड्राईवर ने तोड़ दिया I Ma’am,You have reached. कार सैंडी-फीट होटल तक पहुंच गई। वाकई यह तो सैंडी फीट है। समुद्र तट पर बम्बू की छोटी-छोटी खूबसूरत हट्स बनी हुई और मेरी हट तो एकदम बीच पर है। अहा! अद्भूत! देखा उस रिसोर्ट में सभी नंगे पाव ही घूम रहे हैं क्योंकि वहां रेत ही रेत फैली है। अपनी ‘कुटिया’ में सामान रखकर बाहर आकर रेत में बैठ गई और निहारने लगी समुद्र को। दूर-दूर तक एकदम साफ और सुंदर समुद्र तट। तमाम विदेशी पर्यटक अपने “खुलेपन” में समुद्र का आनंद ले रहे थे । कोई लेटा हुआ, कोई लेपटॉप लेकर बैठा हुआ, कुछ जोड़े समुद्र में काफी अंदर लुत्फ ले रहे थे। मैं चाय लेकर रेत पर ही बैठ गई और अस्ताचल सूर्य को आंखों में उतारने की कोशिश करने लगी।
महानगर की आपाधापी, निजी जीवन के उतार-चढ़ाव, प्रोफेशनल लाइफ के चक्र-कुचक्र से परे मन एकदम शांत हो गया था। समुद्र की किनारे की ओर आती प्रत्येक लहर ऐसा लग रहा था कि मुझ तक आ रही है और मेरे मन की एक-एक हलचल को शांत करती हुई वापिस जा रही है।
उस रिसार्ट में मुझे छोड़कर वहां सब विदेशी थे और सभी जोड़े थे । उसी रिसोर्ट में क्यूं लगभग सभी रिसोर्ट में इका-दुक्का ही भारतीय पर्यटक होंगे। इसके दो कारण है एक तो यह भारतीयों के लिए छुट्टियों का सीजन नहीं है और दूसरे दो दिन बाद यहां विधानसभा चुनाव भी था ।
उस रिसार्ट में मुझे छोड़कर वहां सब विदेशी थे और सभी जोड़े थे । उसी रिसोर्ट में क्यूं लगभग सभी रिसोर्ट में इका-दुक्का ही भारतीय पर्यटक होंगे। इसके दो कारण है एक तो यह भारतीयों के लिए छुट्टियों का सीजन नहीं है और दूसरे दो दिन बाद यहां विधानसभा चुनाव भी था ।
अगर यह फिल्म सेमिनार न होता तो शायद मैं भी न आती। वहीं बैठे-बैठे शाम की घुंध अब रात में बदल गयी। मैं बैठे-बैठे रेत पर पसर गई थी। हाथों का तकिया बनाए आसमान देखने लगी। चांद तो खूब चमक रहा और साथ में ‘ध्रुव तारा’ दपदप हो रहा था। दिल्ली में इतना साफ आसमान नहीं दिखा कभी। साफ की क्या बात करूं इतना सारा आसमान ही नहीं दिखा। ऊंची-ऊंची बिल्डिंगों में सूरज और चांद दोनों ‘गुम’ हो गए हैं जैसे। किसी लड़की के लिए आसमान देखने की चाह कितनी दुर्लभ है,यह वहां मुझे पता चला I
‘मैम आप डिनर में क्या लेना चाहेंगी बैरे ने आकर पूछा! मैंने हंसते हुए कहा की भूख तो लगी है पर खाना यहीं चाहिए । उसने भी मुस्कुराते हुए वहीं गद्दियां और टेबल लगा दी। यह तो मेरे आनंद की पराकाष्ठा हो गई। लेकिन यह आनंद ज्यादा नहीं टिका जब उसने खाने का मैन्यू दिया तो उसमें तो कोई भी भोजन मेरी जान पहचान का न था। इस्रायली, जापानी, थाई, योरोपीयन, रूसी सभी थे,पर भारतीय नहीं था । मैंने उससे पूछा कुछ शाकाहारी है तो दे दो उसने कहा- थोडा समय दीजिये ,अभी बनाते हैं I वाह! क्या बात है।
खा-पीकर अपनी हट में आकर सोने की कोशिश करने लगी। बम्बू हट वाकई सुंदर थी। हालांकि केवल बम्बू की दीवारें थी और छत पर केवल बम्बू ही लगे थे जिसमें से समुद्री हवा सीधे अंदर घुस रही थी। यह मेरे लिए पहला अनुभव था समुद्र के इतने निकट रहने का। रात बढ़ने के साथ लहरें भी बढ़ती हैं। उन की आवाज़ पास से पास, फिर और पास आने लगी। रात को समुद्र का पानी बढ़ता है। थोड़ा डर भी लगा पर डर ज्यादा देर तक नहीं रहा क्योंकि इतनी थकी हुई थी कि झट से नींद आ गई। ऐसा सोई कि सुबह 6 बजे ही जागी। अभी भी घुप्प अंधेरा था।
नया-नया मैंने योग सीखना शुरू किया थाI दिल्ली में मेरी योग गुरु विजया जी ने कहा कि मैम! गोवा में भी अभ्यास करना . उनकी बात याद आ गई इसलिए समुद्र तट पर प्राणायाम शुरू किया। आँख बंद कर अभ्यास करती रही ,आँख खुली तो आसपास का नज़ारा देख कर घबरा गयी I देखा मेरे आस-पास अनेक फिरंगी बैठकर प्राणायाम कर रहे हैं। मुझे देख कर मुस्कुरा दिए और कहने लगे we love to learn yoga . मैं मुस्कुरा दी और मन ही मन कहा –जय बाबा रामदेव ! उन्हें मैंने समझाया कि I am learner, not an instructer.पर वे तो मुझे गुरु मान ही बैठे थे,इसलिए मुझे अपना योग-ज्ञान उडेलना ही पड़ा Iसमस्या यही ख़त्म नहीं हुई क्योंकि उन्होंने आगे के कई दिनों तक मुझसे रोज़ प्राणायाम सिखाने का वायदा भी लिया I
खा-पीकर अपनी हट में आकर सोने की कोशिश करने लगी। बम्बू हट वाकई सुंदर थी। हालांकि केवल बम्बू की दीवारें थी और छत पर केवल बम्बू ही लगे थे जिसमें से समुद्री हवा सीधे अंदर घुस रही थी। यह मेरे लिए पहला अनुभव था समुद्र के इतने निकट रहने का। रात बढ़ने के साथ लहरें भी बढ़ती हैं। उन की आवाज़ पास से पास, फिर और पास आने लगी। रात को समुद्र का पानी बढ़ता है। थोड़ा डर भी लगा पर डर ज्यादा देर तक नहीं रहा क्योंकि इतनी थकी हुई थी कि झट से नींद आ गई। ऐसा सोई कि सुबह 6 बजे ही जागी। अभी भी घुप्प अंधेरा था।
नया-नया मैंने योग सीखना शुरू किया थाI दिल्ली में मेरी योग गुरु विजया जी ने कहा कि मैम! गोवा में भी अभ्यास करना . उनकी बात याद आ गई इसलिए समुद्र तट पर प्राणायाम शुरू किया। आँख बंद कर अभ्यास करती रही ,आँख खुली तो आसपास का नज़ारा देख कर घबरा गयी I देखा मेरे आस-पास अनेक फिरंगी बैठकर प्राणायाम कर रहे हैं। मुझे देख कर मुस्कुरा दिए और कहने लगे we love to learn yoga . मैं मुस्कुरा दी और मन ही मन कहा –जय बाबा रामदेव ! उन्हें मैंने समझाया कि I am learner, not an instructer.पर वे तो मुझे गुरु मान ही बैठे थे,इसलिए मुझे अपना योग-ज्ञान उडेलना ही पड़ा Iसमस्या यही ख़त्म नहीं हुई क्योंकि उन्होंने आगे के कई दिनों तक मुझसे रोज़ प्राणायाम सिखाने का वायदा भी लिया I
पर फिलहाल अपने अभी-अभी बने शिष्यों को योग महिमा समझा कर मैं समुद्र-बीच पर आगे बढ़ी I बीच पर खूबसूरत या फिर खूबसूरत की श्रेणी में नहीं आने वाली तमाम फिरंगी लड़कियां और औरते काफी खुलेपन से घूम रही थी। यह खुलापन देखकर एहसास हुआ कि क्यों भारत के ‘भद्र-पुरुष पर्यटक’ यहां ज्यादा आते हैं और यहां आने के बाद अपने घरवालों के ‘फोन’ भी नहीं उठाते हैं। खैर.. मैंने थोड़ी देर बीच-फुटबाल और बीच-क्रिकेट का आनंद लिया, फिर उठ ली शहर देखने के लिए I
मुझे शहर की सुबह और शाम दोनों ही मिजाज देखने होते हैI पैदल ही गलियों में घूमने लगी। छोटी-छोटी घुमावदार सड़के साफ-सुथरी, पुर्तगाली प्रभाव के मकान..इन सबको देख कर ऐसा लग रहा था कि मैं मानों मध्य कालीन योरोप के समय में हूं। बच्चे स्कूल ड्रैस में सजे हुए, स्कूल जा रहे थे। फिरंगियों के लिये जगह-जगह योगा केंद्र बने हुए थे । तमाम औरते गजरा लगाए हुए सब्जी बेच रही थी या सड़क सफाई कर रही थी।
सोचा चाय पी जाये और कुछ लोकल खाया जाये I एक छोटी सी चाय की दूकान खुली थी I अपन जा कर एक बेंच पर जाकर बैठे और देखने लगे कि लोग क्या खा रहे हैं I चाय-समोसा स्थानीय लोगों की पसंद थी I तभी मेरे सामने तकरीबन साढ़े छह फुट लम्बा एक खूबसूरत फिरंगी आकर बैठ गया Iबहुत सधा और कसा हुआ शरीर! उसकी शक्ल हॉलीवुड हीरो जॉर्ज क्लूनी से काफी मिलती जुलती थी I हो सकता है कि जॉर्ज क्लूनी ही हो! यहाँ तो सब आते रहते हैं I अरे जो भी हो अपन को क्या करना Iउसने मुझे देखा और मुस्कुराया I दरअसल जब लन्दन में थी तो मुझे ये अंदाज़ा हुआ था कि ये अँगरेज़ लोग जब भी किसी को देखते है तो सौजन्यतावश मुस्कुराते हैं I अगर भारत में कोई पुरुष किसी स्त्री को देख कर वैसे ही मुस्कुरा दे तो बेचारा पिट जाएगा I
मैंने देखा उसने आर्डर किया रगडा-पैटीज़ ! नाम बहुत हिंसक सा था पर देखने में देखने में उतना ही स्वादिष्ट लग रहा था इसलिए मैंने भी वही आर्डर कर दिया I चाय पीते-पीते बातचीत शुरू हुई तो पता चला कि वह अमेरिकन प्रोडक्शन कंपनी में सिनेमाटोग्राफर हैI इसी सिलसिले में भारत आना हुआ और कई महीनो से वहीँ है I अपन जहाँ जाते हैं अपने ही प्रोफेशन के लोग मिलते जाते हैंI चाय पीते पीते उसने पुछा कि मैं यहाँ कैसे आई ,तभी मुझे याद आया की मैं तो सेमिनार में आई हूँ,और बस एक घंटा रह गया है उसके शुरू होने में I अपन निकल लिए फ़टाफ़ट हिंदी सिनमा में स्त्री की सुगति- दुर्गति पर अपनी बात कहने के लिए I
मैंने देखा उसने आर्डर किया रगडा-पैटीज़ ! नाम बहुत हिंसक सा था पर देखने में देखने में उतना ही स्वादिष्ट लग रहा था इसलिए मैंने भी वही आर्डर कर दिया I चाय पीते-पीते बातचीत शुरू हुई तो पता चला कि वह अमेरिकन प्रोडक्शन कंपनी में सिनेमाटोग्राफर हैI इसी सिलसिले में भारत आना हुआ और कई महीनो से वहीँ है I अपन जहाँ जाते हैं अपने ही प्रोफेशन के लोग मिलते जाते हैंI चाय पीते पीते उसने पुछा कि मैं यहाँ कैसे आई ,तभी मुझे याद आया की मैं तो सेमिनार में आई हूँ,और बस एक घंटा रह गया है उसके शुरू होने में I अपन निकल लिए फ़टाफ़ट हिंदी सिनमा में स्त्री की सुगति- दुर्गति पर अपनी बात कहने के लिए I
सेमिनार चाहे देशी हो या विदेशी,बातें तो होती रहती हैं पर मेरे लिए तो लोगों से मिलना बहुत महत्वपूर्ण होता है Iयहाँ भी जहाँ कलकत्ता विश्वविद्यालय की ममता ,JNU की विभावरी ,मुंबई के मनीष और ओमप्रकाश ,गोवा के प्रमोद जैसे लोगों से जान-पहचान हुई ,वहीँ पुरानी परिचित रायपुर की सुभद्रा राठौर से भी मुलाकात हुईI भारतीय ,कनाडा ,फ्रांस ,ऑस्ट्रेलिया आदि के फिल्म कलाकारों से मिलना भी ठीक ही रहा I
पर सर्वाधिक सुखद रहा ममता और विभावरी के साथ गोवा की सड़कें छानना ,विचित्र नामों वाले कोल्ड ड्रिंक पीना , हम तीनों का अपने -अपने जीवन अनुभवों का निर्भय होकर साझा करना ... और.. और.. और.. किसी की परवाह किये बिना हँसते जाना और हँसते जाना Iसच में गोवा मैं आई ज़रूर अकेली थी पर वापिस अकेली नहीं जा रही हूँ Iकुछ मज़बूत दोस्ती साथ ले जा रही हूँ I

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