वैसे भी हमें छुट्टी
नहीं मिलती है। इस छुट्टी के कारण ही मैं अपनी एक महीने की स्कॉलरशिप गंवा चुका
हूं। यह एक स्कॉलर का दर्द है जिसे एक स्कॉलर ही समझ सकता है। गाइड मेहरबान तो गधा
भी पहलवान, नहीं तो मेरी तरह रहो। खैर जब मुझे छुट्टी मिली तो मेरी खुशी का ठिकाना
नहीं रहा। क्योंकि सेमेस्टर खत्म होने कारण हमारी मेस बंद हो गई थी तो खाने की
टेंशन से मुक्ति। इसके अलावा दो कारण और थे जिसकी वजह से मैं बहुत खुश था। पहला तो
दोस्त की शादी में शामिल होने का मौका मिल रहा था। नवंबर में मेरे दो अजीज दोस्तों
में से एक की शादी हुई जिसमें मैं शामिल नहीं हो पाया। कारण था एक्जाम ड्यूटी लगी
थी। यह मेरे दूसरे अजीज दोस्त की शादी थी अगर इसमें शामिल नहीं होता तो इसका मलाल
मुझे जिंदगीभर अखरता। दूसरा कारण था मेरे बड़े भाई की सगाई। वैसे इसमें शामिल न
होने पर जिंदगीभर वाला दुख नहीं आता। क्योंकि यह सगाई है।
कहने का अर्थ है कि
छुट्टी मिलने के कारण मुझे तीन-तीन खुशियां एक साथ मिल गई। इन्हीं खुशियों के साथ
मैंने जाने की तैयारियां शुरू कर दी। मेरी एक आदत है कि मैं अंतिम समय तक
तैयारियां नहीं करता। करीब दो-तीन घंटे पहले सब कुछ पैक कर निश्चिंत हो जाता हूं।
शुक्रवार रात नौ बजे की मेरी ट्रेन थी। मैं बहुत उत्साहित था साथ ही थोड़ा उदास
भी। पता नहीं हॉस्टल में मेरे साथ ही ऐसा होता है या हर हॉस्टेलियर के साथ ऐसा
होता है। जब भी मैं घर आने लगता हूं तो मित्रों से दूर जाने का गम दिल में कहीं न
कहीं उठ ही जाता है। भले ही हम केवल कुछ दिन के लिए घर जा रहे हो। शायद हॉस्टल
लाइफ की यही सबसे बड़ी खासियत है कि हम ऐसे दोस्त बनाते है जो जिनसे दोनों समय
मिलने और बिछड़ने पर आंखे नम हो ही जाती हैं। आंसू भले ही न निकले। वह शाम भी कुछ
ऐसी ही थी। मुझे बस तक छोड़ने दो दोस्त आए और जब बस में चढ़ने से पहले उनसे गले
मिला तो दिल भर गया। बहरहाल मैं बस मैं बैठ गया जो मुझे यूनिवर्सिटी कैंपस से
रेलवे स्टेशन ले गई। मैं करीब तीन घंटे पहले रेलवे स्टेशन पहुंच गया। बस में एक
पुराने जानकार मिल गए। उन्हें भी ट्रेन पकड़नी थी लेकिन वह दूसरी दिशा में जा रहे
थे। स्टेशन पर एक सर मिले जो अपनी शादी के लिए जा रहे थे। शादी........... लगता है
इस साल मुझे छोड़ कर सभी शादी कर रहे हैं। मेरे कई जानकारों की शादी इस साल हो गई
और एक हम है कि शादी तो छोड़िए लाइफ जा कहां रही है इसका ही अता-पता नहीं है।
खैर मेरी ट्रेन
हिराकुंड एक्सप्रैस करीब आधे घंटे की देरी से स्टेशन पर आ गई। मुझे पूरी उम्मीद थी
कि अगले दिन की दोपहर को मैं अपने घर पर रहूंगा। खाना मैंने अपने मित्र (जो बस में
मिले थे) के साथ स्टेशन पर ही खा लिया था, तो ट्रेन में केवल मुझे सोना था। ट्रेन
में मुझे हमेशा सबसे ऊपर की सीट चाहिए। कारण दो- पहला जब मन किया सो लिया और दूसरा
कि मेरे पैर सीट से थोड़े बाहर निकल आते हैं तो ऊपर होने के कारण किसी से टकराते
नहीं है। ठंड थी तो मैं जैकेट पहन और चद्दर तान कर सो गया इस उम्मीद में की अपने
समय से मैं दिल्ली पहुंच जाउंगा। क्योंकि उसके अगले दिन सुबह 6 बजे मुझे अपने
मित्र की शादी में अमरोहा निकलाना था। दिल्ली से अमरोहा का रास्ता बस से करीब 3
घंटे का है जिसे पूरा करने में उसे चार घंटे से ज्यादा लग जाते हैं।
सुबह समय से मैं उठ
गया। ट्रेन भी ज्यादा देर से नहीं चल रही थी। करीब आधे घंटे की ही देरी से चल रही
थी। मैंने सोचा एक नींद और ले ली जाए, वैसे भी तीन बजे से पहले तो ट्रेन दिल्ली
नहीं पहुंचेगी। इस बार जब उठा तब करीब साढ़े दस बज रहे थे। मैंने ट्रेन के एप में
देखा कि ट्रेन दिल्ली कब पहुंच रही है तो उसमें जो लिखा आया उसे देखकर मैं चौंक
गया। उसमें लिखा था आपका स्टेशन कैंसल हो गया है। मैं कुछ समझा नहीं। क्योंकि इससे
पहले ऐसा वाकया मेरे साथ कभी नहीं हुआ था। मुझे लगा कि एप में कुछ गड़बड़ है। तभी
नीचे पैंट्री वाला किसी से बात कर रहा था कि ट्रेन का रूट बदल दिया गया है। अब यह
ट्रेन दिल्ली नहीं जाएगी...। मैं सोच में पड़ गया। अब समय से पहुंचना तो दूर....
मैं केवल दिल्ली पहुंचने की बारे में सोचने लगा। पैंट्री वाले ने कहा कि ट्रेन
गाजियाबाद जाएगी.. मैंने कहा चलो ठीक है। वहीं से दिल्ली चले जाएंगे। तो मैंने
गाजियाबाद में अपने भइया को फोन किया। पहले से इंतजाम कर लेना ठीक रहता है। तो
उन्होंने बताया कि पल्लवल और निजामुद्दीन के बीच कोई काम चल रहा है इसलिए वह रूट
बंद कर दिया गया है। जिसके कारण सारी गाड़िया दूसरे रूट से जा रही हैं।
पैंट्री वाले की बात से
मेरा मन शांत नहीं हुआ। मैं टी-टी की तलाश में निकला। जो मुझे एसी सेकेंड क्लास
में मिला जो मेरे कोच से करीब 9 डिब्बा दूर था। टीटी से मैंने पूछा ट्रेन कहां जा
रही है। उसने कहा- ‘पानीपत’
‘वो तो मुझे भी
पता है। लेकिन किस रूट से जा रही है।’
‘ट्रेन
अलीगढ़ होके जाएगी’
मैंने
कहा- दिल्ली के नजदीक किस स्टेशन को जाएगी।
टीटी
ने कहा मुझे इसकी जानकारी नहीं है। मैंने पूछा क्या गाजियाबाद जाएगी। इसके जवाब
में उसका वही उत्तर था मुझे नहीं मालुम, आगरा जाकर चीजे कुछ पता चलेंगी। मैंने मन
ही मन सोचा। जब संचार प्रणाली इतनी कुशल हो गई है तब यह हाल है कि ट्रेन कहां जा
रही है किसी को कुछ पता ही नहीं है। खैर मैं वापस आ गया। मेरी सीट के आस-पास के
लोगों ने मुझे घेर लिया। पूछने लगे कि
टीटी ने क्या कहा... मैं उनसे क्या कहता। मैंने कहा आगरा में चीजे पता चलेंगी। बस
यही जानकारी है कि यह ट्रेन आगरा से दूसरे रूट से जाएगी। अब दिल्ली की जगह इंतजार
आगरा को होने लगा।
ट्रेन
आगरा पहुंची तो ट्रेन से उतरने वालों का तांता लग गया। बहुत से दिल्ली जाने वाले
लोग आगरा में ही उतर गए। मैं टीटी को खोजने लगा.. लेकिन वह मिला नहीं। तभी लाउड
स्पीकर से घोषणा हुआ कि यह ट्रेन अलीगढ़ मेरठ होते हुए पानीपत जाएगी। यानी
गाजियाबाद भी गया। मैंने झठ से फोन में देखा कि मेरठ से दिल्ली की दूरी कितनी है।
करीब 90 किलोमीटर। तो मैंने तय किया मेरठ से ही दिल्ली जाया जाएगा। मेरा
आत्मविश्वास देखकर दो लोग और मेरे साथ रूक गए। वहीं दूसरी ओर इंटरनेट पर दिखा रहा
था कि ट्रेन अलगीढ़-खुर्जा-गाजियाबाद होते हुए जाएगी। मैं असमंजस में था कि ट्रेन
जा कहां रही है। अनुमानित समय गाजियाबाद का 5 पांच बजे बता रहा था। मैंने सोचा
इतना समय काफी है। अब सोच लिया कि ट्रेन कहीं भी जाए अब इसी से चला जाएगा। ट्रेन
को अलीगढ़ करीब तीन बजे पहुंचना था लेकिन आगरा से ट्रेन चल नहीं रही थी रेंग रही
थी। दो मिनट रेंगती दस मिनट रूकती। इसी तरह रूकती-छुकती ट्रेन छह बजे अलीगढ़
पहुंची। अब मुझे लगने लगा कि कहीं मैंने आगरा न उतर कर कहीं गलती तो नहीं कर दी। ट्रेन
ने शारीरिक कम लेकिन मानसिक रूप से ज्यादा थका दिया था। वहीं मेरी पीछे की सीट पर
एक जनाब भारत की पूरी अर्थव्यवस्था को लेकर बैठे थे। नोटबंदी से लेकर बुलेट ट्रेन
न जाने कितने विषयों पर उन्होंने अपनी विशेषज्ञता सामने वाले पर थोप दी थी। ट्रेन
में ऐसे लोगों का मिलना कोई नई बात नहीं है। जापान का उदाहरण देते हुए उन्होंने
कहा कि अगर जापान में ट्रेन एक घंटा देर हो जाए तो संबंधित अधिकारी की नौकरी चली
जाती है। लेकिन एक यहां है कि कोई सुध लेने वाला नहीं है।
सफर
भी बहुत मजेदार चीज होती है। यह ऐसे-ऐसे अनुभव देती है जो आपको और कहीं नहीं मिल
सकता। कब कौन सी परिस्थिति आपके सामने आ जाए आपको इसका अंदाजा भी नहीं होता। अनजान
स्टेशन पर ट्रेन छूटने लेकर हमारी तरह ट्रेन का रूट बदलने जैसी स्थिति कभी भी आ
सकती है। सफर आपको ऐसी की अकस्माक समय के लिए तैयार करता है। इसलिए मैं तो कहता
हूं कि सफर सभी को करना चाहिए।
बहरहाल
अलीगढ़ से हमारी ट्रेन निकली और खुर्जा पर आकर रूक गई। यहां इसका स्टॉप था। तभी
घोषणा हुई की यह ट्रेन मेरठ जा रही है, गाजियाबाद का कोई जिक्र नहीं। मोबाइल में
दिखा रहा था कि खुर्जा से गाजियाबाद होकर रूट है लेकिन यही बात कोई इनसान नहीं बता
रहा था। मेरी तरह दूसरे कई यात्री भी परेशान थे। खुर्जा से आनंद विहार स्टेशन की
दूसरी करीब 90 किमी थी और मेरठ से भी। मैंने सोचना खुर्जा से ही दूसरी ट्रेन पकड़ी
जाए। लेकिन यह कोई ऐसा स्टेशन नहीं था जहां हर गाड़ी रूकती हो। मैं सामान लेकर
नीचे उतर गया। तभी मेरे साथ जो व्यक्ति थे उन्होंने कहा कि सामने आनंद विहार की
गाड़ी खड़ी है। वह हावड़ा-आनंद विहार एक्सप्रैस थी। जिसका वहां स्टॉप नहीं था
लेकिन सिगनल न मिलने के कारण वहां रूकी हुई थी। हम सभी लोग उसमें सवार हो गए। अब
इतना तो निश्चित था कि हम लोग आनंद विहार पहुंच जाएंगे और वहां से मेट्रो पकड़ी जा
सकती है। उस ट्रेन में चढ़ने के बाद लगा जैसे वह ट्रेन हमारे लिए वहां रूकी हो।
क्योंकि उस ट्रेन का तो अलीगढ़ में भी स्टॉप नहीं था। साढ़े 6 बजे के करीब हम उस
ट्रेन में चढ़े, उसे सवा घंटे में आनंद विहार उतारना था लेकिन लाइन क्लीयर न होने के
कराण वह भी ट्रेन काफी रूक-रूक कर चल रही थी। मैं गेट के पास ही खड़ा था। ठंड का
मौसम, तेज आती हुआ हवा काफी सिहरन पैदा कर रही थी। फिर भी अच्छा लग रहा था।
क्योंकि अब इस बात की चिंता नहीं थी हम कहां जा रहे हैं। अब ट्रेन कभी भी पहुंचे
आनंद विहार तो जा रही थी। साढ़े आठ के करीब हम आनंद विहार उतरे। दिल को शांति
मिली। मैंने मेट्रो ली और करीब 11 बजे मैं घर पहुंचा। मुझे दोपहर में पहुंचना था
इसलिए मेरी मां ने मेरी मनपसंद साग-चावल-धनिया की चटनी की बनाई थी। वह ठंडी चुकी
थी लेकिन खाने के साथ मैंने वह साग खाया। सारी थकान अब कहीं धूमिल हो रही थी।






