Wednesday, 18 March 2020

भाषा और समाज /अविचल गौतम(ivth sem)



एम।फिल।(भाषा प्रौद्योगिकी)
मेरी दृष्टि से भाषा मात्र मनुष्य के मनुष्य होने की पहचान और शर्त है। भाषा के बिना मनुष्य नहीं होता, पशु से मनुष्य के विकास में भाषा ही वह सीढ़ी है जिस को पार करके वह मनुष्यत्व प्राप्त करता है। अवधारणा करने की शक्ति और उसके साथ-साथ यह प्रश्न पूछने की शक्ति कि मैं कौन हूँ या कि मैं क्या हूँ या मैं क्यों हूँ। यही मनुष्यत्व की पहचान है,और यह शक्ति तब से प्रारम्भ होती है जब से जीव को भाषा मिलती है। भाषा मिलने के बाद यह मनुष्य रूपी जीव उसी प्रकार के सभी पशु रूपी जीवों से अलग हो जाता है।
भाषा के बिना समाज में अपनी अस्मिता की पहचान नहीं हो सकती। अत: सब से पहले भाषा अपने-आप को पहचानने का साधन है। अगर किसी समाज को उसकी भाषा से काट दिया जाये तो हम उसकी अस्मिता को खंडित कर देते हैं। हिंदी के प्रति मेरा जो लगाव है, उसकी बुनियाद में केवल अपने मनुष्य होने को नहीं बल्कि अपने पहचाने जाने की पहली और मूल भाषा मानता हूँ। हिंदी के बिना मैं, मैं नहीं रहता।
भाषा मूल्यों की सृष्टि करना संभव बनाती है। मनुष्य की जिजीविषा ही अंतिम और स्वयंसिध्द तर्क होता है, जीने के लिए। मनुष्य भाषा के माध्यम से ऐसे मूल्यों की सृष्टि करता है, जिनके लिए वह जीता है।
भाषा के द्वारा हम यथार्थ की एक नए ढंग़ की पहचान कर सकते हैं। जिस चीज को हम पहचान रहे हैं, उसको आत्मसात कर के उसके प्रति किसी तरह की भी विवके पर आधारित प्रतिक्रिया हम भाषा के बिना नहीं कर सकते। प्रतिक्रिया, अभिव्यक्ति और संप्रेष्ण भाषा के बिना संभव नहीं है।
भाषा एक समग्र संस्कृति की आत्माभिव्यक्ति का साधन है, लेकिन उसके साथ-साथ वह स्वरूप रक्षा का भी एक साधन है। समाज के साथ जब हम भाषा को जोडते हैं तो उसकी युगधर्मिता की ओर ध्यान देते हैं। आखिर हमारे सारे सामाजिक व्यवहार का आधार भाषा है, और भाषा है भी सामाजिक व्यवहार के लिए।
भाषा का एक फंक्षनल या प्रयोजनमूलक उपयोग है, हमारे दैनंदिन जीवन में उसका एक स्थान है। हमारे प्रयोजनों का वह साधन है। भाषा के बिना व्यवहार नहीं हो सकता और जिस भाषा का व्यवहार से संबंध नहीं है, वह भाषा समाज से भी टूट जाएगी। इसलिए जब पूरी संस्कृति का अवमूल्यन होता है तो समाज का अवमूल्यन होता है इसलिए भाषा का भी अवमूल्यन होता है।
भाषा में सर्जनशीलता है। हम देखते हैं कि कई समाज ऐसे होते है जिनमें सर्जनशीलता का स्थान उंचा होता है, और कई समाज ऐसे भी हैं जो कि एक खास तरह की मानसिक जड़ता गति का अभाव तथा सर्जनशीलता को विलासिता समझते हैं। यह इसलिए कि भाषा के मामले में सर्जनशीलता के प्रति एक संदेह का भाव है।
जिस परिस्थिति में हम जीते हैं, उसमें हमें निरंतर ध्यान में रखना चाहिए कि पूरा समाज जिस भाषा के साथ जीता है, उसमें और उसके साथ जीते हुए अगर हम उस जीवन संदर्भ को पहचानते हैं, और उस भाषा में रचना करते हैं, तो हमारा समाज भी रचनाशील हो सकता है। नहीं तो वहां भी उस के सामने नयी स्थिति एक चुनौती बन कर आती है। जरूरी नहीं की वह काव्य की कोई समस्या हो, जरूरी नहीं है कि विज्ञापन या रसायन की नई परिस्थिति हो। कोई भी नई चीज अनुवादजीवी समाज के सामने आती है, तो वह तुरंत दूसरे का मुँह देखने लगता है, क्योंकि अपनी शक्ति को पहचानना उसने सीखा ही नहीं। भाषा हमारी शक्ति है, उस को हम पहचाने-वह रचनाशीलता का उत्स है-व्यक्ति के लिए भी और समाज के लिए भी।
भाषा का अपना समाजशास्त्र होता है। कभी भाषा समाज को परिभाषित करती है, तो कभी समाज, भाषा को। समाज की प्रत्येक गतिविधि भाषा के माध्यम से तय होती है। हम अपने प्राचीन काव्य एवं परंपराओं का अवलोकन करें तो भाषिक स्तर पर समाज बँटा मिलेगा। भाषा का समाजशास्त्र ही इस बात का जवाब दे देगा कि मागधी प्राकृत के साथ संस्कृत आचार्यों ने सौतेला व्यवहार क्यों किया। इस तथ्य पर ध्यान देना चाहिए कि आखिर संस्कृत नाटकों में निम्न श्रेणी के पात्र इसका प्रयोग क्यों करते हैं? संस्कृत नाटकों में माँ प्राकृत बोलती है, बेटा संस्कृत बोलता है। लिंग के हिसाब से किसी समाज की भाषा नही बदलती है। वस्तुत: वर्ण-व्यवस्था के आधार पर भाषा को आरोपित किया गया है। प्राकृत निम्न श्रेणी के पात्रों पर उपर से थोपी गयी है, इसीलिए यह भाषा कृत्रिम है। सवाल है कि क्या भोजपुरी उसी की कोख से पैदा हुयी है? भोजपुरी का समाज यह मानने से रोकता है। भोजपुरी कृषि एवं श्रम-संस्कृति की भाषा है। इसके शब्दों में भोजपुर की माटी की सोंधी गंध है। यह मेहनतकशों और कामगारों, किसानों और मजदूरों की भाषा है।
अत: भाषा और समाज का नितांत गहरा संबंध है। समाज की हर झलक सुख, दुख, पीड़ा, अवसाद, गति, मूल्यों से संश्लिष्ट संस्कृति भाषा में बोलती है। यही भाषा का समाज-शास्त्र है।

Friday, 15 December 2017

एक सफर ऐसा भी



वैसे भी हमें छुट्टी नहीं मिलती है। इस छुट्टी के कारण ही मैं अपनी एक महीने की स्कॉलरशिप गंवा चुका हूं। यह एक स्कॉलर का दर्द है जिसे एक स्कॉलर ही समझ सकता है। गाइड मेहरबान तो गधा भी पहलवान, नहीं तो मेरी तरह रहो। खैर जब मुझे छुट्टी मिली तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। क्योंकि सेमेस्टर खत्म होने कारण हमारी मेस बंद हो गई थी तो खाने की टेंशन से मुक्ति। इसके अलावा दो कारण और थे जिसकी वजह से मैं बहुत खुश था। पहला तो दोस्त की शादी में शामिल होने का मौका मिल रहा था। नवंबर में मेरे दो अजीज दोस्तों में से एक की शादी हुई जिसमें मैं शामिल नहीं हो पाया। कारण था एक्जाम ड्यूटी लगी थी। यह मेरे दूसरे अजीज दोस्त की शादी थी अगर इसमें शामिल नहीं होता तो इसका मलाल मुझे जिंदगीभर अखरता। दूसरा कारण था मेरे बड़े भाई की सगाई। वैसे इसमें शामिल न होने पर जिंदगीभर वाला दुख नहीं आता। क्योंकि यह सगाई है।

कहने का अर्थ है कि छुट्टी मिलने के कारण मुझे तीन-तीन खुशियां एक साथ मिल गई। इन्हीं खुशियों के साथ मैंने जाने की तैयारियां शुरू कर दी। मेरी एक आदत है कि मैं अंतिम समय तक तैयारियां नहीं करता। करीब दो-तीन घंटे पहले सब कुछ पैक कर निश्चिंत हो जाता हूं। शुक्रवार रात नौ बजे की मेरी ट्रेन थी। मैं बहुत उत्साहित था साथ ही थोड़ा उदास भी। पता नहीं हॉस्टल में मेरे साथ ही ऐसा होता है या हर हॉस्टेलियर के साथ ऐसा होता है। जब भी मैं घर आने लगता हूं तो मित्रों से दूर जाने का गम दिल में कहीं न कहीं उठ ही जाता है। भले ही हम केवल कुछ दिन के लिए घर जा रहे हो। शायद हॉस्टल लाइफ की यही सबसे बड़ी खासियत है कि हम ऐसे दोस्त बनाते है जो जिनसे दोनों समय मिलने और बिछड़ने पर आंखे नम हो ही जाती हैं। आंसू भले ही न निकले। वह शाम भी कुछ ऐसी ही थी। मुझे बस तक छोड़ने दो दोस्त आए और जब बस में चढ़ने से पहले उनसे गले मिला तो दिल भर गया। बहरहाल मैं बस मैं बैठ गया जो मुझे यूनिवर्सिटी कैंपस से रेलवे स्टेशन ले गई। मैं करीब तीन घंटे पहले रेलवे स्टेशन पहुंच गया। बस में एक पुराने जानकार मिल गए। उन्हें भी ट्रेन पकड़नी थी लेकिन वह दूसरी दिशा में जा रहे थे। स्टेशन पर एक सर मिले जो अपनी शादी के लिए जा रहे थे। शादी........... लगता है इस साल मुझे छोड़ कर सभी शादी कर रहे हैं। मेरे कई जानकारों की शादी इस साल हो गई और एक हम है कि शादी तो छोड़िए लाइफ जा कहां रही है इसका ही अता-पता नहीं है।

खैर मेरी ट्रेन हिराकुंड एक्सप्रैस करीब आधे घंटे की देरी से स्टेशन पर आ गई। मुझे पूरी उम्मीद थी कि अगले दिन की दोपहर को मैं अपने घर पर रहूंगा। खाना मैंने अपने मित्र (जो बस में मिले थे) के साथ स्टेशन पर ही खा लिया था, तो ट्रेन में केवल मुझे सोना था। ट्रेन में मुझे हमेशा सबसे ऊपर की सीट चाहिए। कारण दो- पहला जब मन किया सो लिया और दूसरा कि मेरे पैर सीट से थोड़े बाहर निकल आते हैं तो ऊपर होने के कारण किसी से टकराते नहीं है। ठंड थी तो मैं जैकेट पहन और चद्दर तान कर सो गया इस उम्मीद में की अपने समय से मैं दिल्ली पहुंच जाउंगा। क्योंकि उसके अगले दिन सुबह 6 बजे मुझे अपने मित्र की शादी में अमरोहा निकलाना था। दिल्ली से अमरोहा का रास्ता बस से करीब 3 घंटे का है जिसे पूरा करने में उसे चार घंटे से ज्यादा लग जाते हैं। 

सुबह समय से मैं उठ गया। ट्रेन भी ज्यादा देर से नहीं चल रही थी। करीब आधे घंटे की ही देरी से चल रही थी। मैंने सोचा एक नींद और ले ली जाए, वैसे भी तीन बजे से पहले तो ट्रेन दिल्ली नहीं पहुंचेगी। इस बार जब उठा तब करीब साढ़े दस बज रहे थे। मैंने ट्रेन के एप में देखा कि ट्रेन दिल्ली कब पहुंच रही है तो उसमें जो लिखा आया उसे देखकर मैं चौंक गया। उसमें लिखा था आपका स्टेशन कैंसल हो गया है। मैं कुछ समझा नहीं। क्योंकि इससे पहले ऐसा वाकया मेरे साथ कभी नहीं हुआ था। मुझे लगा कि एप में कुछ गड़बड़ है। तभी नीचे पैंट्री वाला किसी से बात कर रहा था कि ट्रेन का रूट बदल दिया गया है। अब यह ट्रेन दिल्ली नहीं जाएगी...। मैं सोच में पड़ गया। अब समय से पहुंचना तो दूर.... मैं केवल दिल्ली पहुंचने की बारे में सोचने लगा। पैंट्री वाले ने कहा कि ट्रेन गाजियाबाद जाएगी.. मैंने कहा चलो ठीक है। वहीं से दिल्ली चले जाएंगे। तो मैंने गाजियाबाद में अपने भइया को फोन किया। पहले से इंतजाम कर लेना ठीक रहता है। तो उन्होंने बताया कि पल्लवल और निजामुद्दीन के बीच कोई काम चल रहा है इसलिए वह रूट बंद कर दिया गया है। जिसके कारण सारी गाड़िया दूसरे रूट से जा रही हैं। 

पैंट्री वाले की बात से मेरा मन शांत नहीं हुआ। मैं टी-टी की तलाश में निकला। जो मुझे एसी सेकेंड क्लास में मिला जो मेरे कोच से करीब 9 डिब्बा दूर था। टीटी से मैंने पूछा ट्रेन कहां जा रही है। उसने कहा- पानीपत
वो तो मुझे भी पता है। लेकिन किस रूट से जा रही है।
ट्रेन अलीगढ़ होके जाएगी
मैंने कहा- दिल्ली के नजदीक किस स्टेशन को जाएगी।

टीटी ने कहा मुझे इसकी जानकारी नहीं है। मैंने पूछा क्या गाजियाबाद जाएगी। इसके जवाब में उसका वही उत्तर था मुझे नहीं मालुम, आगरा जाकर चीजे कुछ पता चलेंगी। मैंने मन ही मन सोचा। जब संचार प्रणाली इतनी कुशल हो गई है तब यह हाल है कि ट्रेन कहां जा रही है किसी को कुछ पता ही नहीं है। खैर मैं वापस आ गया। मेरी सीट के आस-पास के लोगों ने मुझे घेर लिया।  पूछने लगे कि टीटी ने क्या कहा... मैं उनसे क्या कहता। मैंने कहा आगरा में चीजे पता चलेंगी। बस यही जानकारी है कि यह ट्रेन आगरा से दूसरे रूट से जाएगी। अब दिल्ली की जगह इंतजार आगरा को होने लगा। 

ट्रेन आगरा पहुंची तो ट्रेन से उतरने वालों का तांता लग गया। बहुत से दिल्ली जाने वाले लोग आगरा में ही उतर गए। मैं टीटी को खोजने लगा.. लेकिन वह मिला नहीं। तभी लाउड स्पीकर से घोषणा हुआ कि यह ट्रेन अलीगढ़ मेरठ होते हुए पानीपत जाएगी। यानी गाजियाबाद भी गया। मैंने झठ से फोन में देखा कि मेरठ से दिल्ली की दूरी कितनी है। करीब 90 किलोमीटर। तो मैंने तय किया मेरठ से ही दिल्ली जाया जाएगा। मेरा आत्मविश्वास देखकर दो लोग और मेरे साथ रूक गए। वहीं दूसरी ओर इंटरनेट पर दिखा रहा था कि ट्रेन अलगीढ़-खुर्जा-गाजियाबाद होते हुए जाएगी। मैं असमंजस में था कि ट्रेन जा कहां रही है। अनुमानित समय गाजियाबाद का 5 पांच बजे बता रहा था। मैंने सोचा इतना समय काफी है। अब सोच लिया कि ट्रेन कहीं भी जाए अब इसी से चला जाएगा। ट्रेन को अलीगढ़ करीब तीन बजे पहुंचना था लेकिन आगरा से ट्रेन चल नहीं रही थी रेंग रही थी। दो मिनट रेंगती दस मिनट रूकती। इसी तरह रूकती-छुकती ट्रेन छह बजे अलीगढ़ पहुंची। अब मुझे लगने लगा कि कहीं मैंने आगरा न उतर कर कहीं गलती तो नहीं कर दी। ट्रेन ने शारीरिक कम लेकिन मानसिक रूप से ज्यादा थका दिया था। वहीं मेरी पीछे की सीट पर एक जनाब भारत की पूरी अर्थव्यवस्था को लेकर बैठे थे। नोटबंदी से लेकर बुलेट ट्रेन न जाने कितने विषयों पर उन्होंने अपनी विशेषज्ञता सामने वाले पर थोप दी थी। ट्रेन में ऐसे लोगों का मिलना कोई नई बात नहीं है। जापान का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि अगर जापान में ट्रेन एक घंटा देर हो जाए तो संबंधित अधिकारी की नौकरी चली जाती है। लेकिन एक यहां है कि कोई सुध लेने वाला नहीं है। 

सफर भी बहुत मजेदार चीज होती है। यह ऐसे-ऐसे अनुभव देती है जो आपको और कहीं नहीं मिल सकता। कब कौन सी परिस्थिति आपके सामने आ जाए आपको इसका अंदाजा भी नहीं होता। अनजान स्टेशन पर ट्रेन छूटने लेकर हमारी तरह ट्रेन का रूट बदलने जैसी स्थिति कभी भी आ सकती है। सफर आपको ऐसी की अकस्माक समय के लिए तैयार करता है। इसलिए मैं तो कहता हूं कि सफर सभी को करना चाहिए। 

बहरहाल अलीगढ़ से हमारी ट्रेन निकली और खुर्जा पर आकर रूक गई। यहां इसका स्टॉप था। तभी घोषणा हुई की यह ट्रेन मेरठ जा रही है, गाजियाबाद का कोई जिक्र नहीं। मोबाइल में दिखा रहा था कि खुर्जा से गाजियाबाद होकर रूट है लेकिन यही बात कोई इनसान नहीं बता रहा था। मेरी तरह दूसरे कई यात्री भी परेशान थे। खुर्जा से आनंद विहार स्टेशन की दूसरी करीब 90 किमी थी और मेरठ से भी। मैंने सोचना खुर्जा से ही दूसरी ट्रेन पकड़ी जाए। लेकिन यह कोई ऐसा स्टेशन नहीं था जहां हर गाड़ी रूकती हो। मैं सामान लेकर नीचे उतर गया। तभी मेरे साथ जो व्यक्ति थे उन्होंने कहा कि सामने आनंद विहार की गाड़ी खड़ी है। वह हावड़ा-आनंद विहार एक्सप्रैस थी। जिसका वहां स्टॉप नहीं था लेकिन सिगनल न मिलने के कारण वहां रूकी हुई थी। हम सभी लोग उसमें सवार हो गए। अब इतना तो निश्चित था कि हम लोग आनंद विहार पहुंच जाएंगे और वहां से मेट्रो पकड़ी जा सकती है। उस ट्रेन में चढ़ने के बाद लगा जैसे वह ट्रेन हमारे लिए वहां रूकी हो। क्योंकि उस ट्रेन का तो अलीगढ़ में भी स्टॉप नहीं था। साढ़े 6 बजे के करीब हम उस ट्रेन में चढ़े, उसे सवा घंटे में आनंद विहार उतारना था लेकिन लाइन क्लीयर न होने के कराण वह भी ट्रेन काफी रूक-रूक कर चल रही थी। मैं गेट के पास ही खड़ा था। ठंड का मौसम, तेज आती हुआ हवा काफी सिहरन पैदा कर रही थी। फिर भी अच्छा लग रहा था। क्योंकि अब इस बात की चिंता नहीं थी हम कहां जा रहे हैं। अब ट्रेन कभी भी पहुंचे आनंद विहार तो जा रही थी। साढ़े आठ के करीब हम आनंद विहार उतरे। दिल को शांति मिली। मैंने मेट्रो ली और करीब 11 बजे मैं घर पहुंचा। मुझे दोपहर में पहुंचना था इसलिए मेरी मां ने मेरी मनपसंद साग-चावल-धनिया की चटनी की बनाई थी। वह ठंडी चुकी थी लेकिन खाने के साथ मैंने वह साग खाया। सारी थकान अब कहीं धूमिल हो रही थी।

Sunday, 22 October 2017

ना जाने कहाँ ले जाएँ हवाएं.. हवाएं … हवाएं..!/स्मिता मिश्र


गुड आफ्टरनून मैम, नमस्ते मैम, ससरियाकाल मैम,हाय मैम !कॉलेज के गलियारे से गुजरते हुए विविध भाषाओँ में अभिवादन स्वीकार करती हुई क्लासरूम की और जा रही हूँ I सिनेमा स्टडीज का पीरियड है I
शुक्रवार के दिन  इसी क्लास के साथ लगातार दो पीरियड होते है तो प्रैक्टिकल भी कराने का दिन होता हैI वैसे भी शुक्रवार बॉक्स-ऑफिस पर नई फिल्म आने का दिन होता है और हमारा सिनेमा पर नया टॉपिक देखने का I आज फिल्म रिव्यु का टॉपिक पढ़ना है I सिलेबस वाली फ़िल्में तो दिखाती ही हूँ ,पर साथ में नई फिल्मों के भी कुछ दृश्यों या गानों पर चर्चा होती है I नई फिल्मों से विद्यार्थी  ज्यादा कनेक्ट होते है,इसलिए उन्हीं का सन्दर्भ लेती हूँ I
विद्यार्थियों से पूछा कि आपने कौन सी नई फिल्म देखी --- ज्यादातर का जवाब था – जब हैरी मेट सेजल .
अच्छा-अच्छा ! शाहरुख साब की! ठीक है .youtube पर देखे इसका कौन सा गाना अवेलेबल है.you tube पर जो गाना उपलब्ध था ---
तुझको मैं रख लू वहां  जहाँ पर है मेरा यकीन / जो मैं तेरा न हुआ तो किसी का नहीं
बेगानी है हवाएं..हवाएं हवाएं / ना जाने कहाँ ले जाएँ हवाएं..हवाएं हवाएं !न तुझको पता न मुझको किधर
बहुत ही सुरीला गीतI सुरीले से ज्यादा मेरे लिए नोस्टेलजिक !
शाहरुख़ साब वर्सटाइल एक्टर तो नहीं है पर जो भाव अमूमन वे अपने चेहरे पर लाते हैं,उसमें उन्हें महारथ हासिल है I  Intense प्रेम के तो वे निस्संदेह बादशाह हैं Iअपनी फिल्मों में वे अपने प्रेम को लेकर जितने intense होते हैं,,वह किसी भी लड़की को आकर्षित करने के लिए काफी हैं Iमुझे यह कहने में संकोच हो रहा है ,फिर भी यह सच है कि मेरे मन में भी प्रेम को लेकर जो संकल्पना रही है ,वह शाहरुख़ जैसे चरित्र पर ही जाकर ठहरती रही Iलेकिन यह भी सच है कि उनकी दो चार फ़िल्में ही मुझे अच्छी लगी I चक दे इंडिया ,दिल तो पागल है स्वदेश और ऑफकोर्स .. दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे I intense प्रेमी और सेंसिबल पुरुष दोनों ही रूपों का गज़ब कॉम्बिनेशन है,जो अमूमन आजकल दिखाई नहीं पडता है (क्षमाप्रार्थी हूँ यदि किसी के दिल पर बात लग गयी हो J)
 ‘विचित्र किन्तु सत्य’ शाहरूख साब  और मैं एक धारावाहिक में साथ काम करते करते रह गए Iअरे रे अभिनय नहीं ,,अपन का काम तो कलम-नवीसी का ही तब भी था,आज भी है I शाहरूख साब  को फौजी सर्कस जैसे धारावाहिकों से यश मिल रहा था Iतब मेरे बड़े भाई हेमंत मिश्र जीवित थे I हेमंत भाई दूरदर्शन और रंगमंच पर काफी ख्याति प्राप्त अभिनेता थे Iउन्ही की प्रेरणा से खेल को केंद्र में रखकर एक धारावाहिक की योजना बन रही थी,जिसकी स्क्रिप्ट मैं लिख रही थी Iमैं बास्केट बॉल की खिलाडी रही तो केंद्र में मैंने बास्केट बॉल को ही रखा i खेल जीवन के तमाम उतार-चढ़ावों को केंद्र में रखकर स्क्रिप्ट लिख रही थी I शाहरूख साब   ने कर्नल कपूर के निर्देशन में ही फौजी में काम किया था और हेमंत भाई ने भी कर्नल कपूर के साथ काम किया था .,इसलिए जब धारावाहिक के लिए मुख्य खिलाडी के किरदार की बात आई तो सबने शाहरूख साब का ही नाम लिया Iहम पैर जिम्मेदारी डाली गयी शाहरूख साब   से स्क्रिप्ट सम्बन्धी बात करने के लिए I
इन दिनों लैंडलाइन फ़ोन होते थे Iमैंने उन्हें फ़ोन किया ,उधर से आवाज़ आई- हेल्लो! शाहरूख साब थेI हेमंत भाई का रिफरेन्स देकर बात शुरू की Iउन्होंने अच्छा खासा इंटरेस्ट दिखाया स्पोर्ट्स सीरियल के नाम परI पर जब उन्हें पता चला कि खेल बास्केटबॉल है तो वे बोले- मैं तो फुटबाल का खिलाडी हूँ  ,बास्केटबॉल तो मुझे आती नहींIमैंने उनसे छूटते ही पूछा-फौजी सीरियल से पहले बन्दूक चलायी थी ? मेरी बात सुनकर वो हँस पड़े और कहा –गुड पॉइंट I आप स्क्रिप्ट कब सुनाएंगी? मैं अभी सर्कस की शूटिंग में बैंगलोर जा रहा हूँ ,वापिस आकर आपको फ़ोन करता हूँ Iआप अपना नंबर दे दीजिये I मुझे अपना नंबर देने में थोड़ी झिझक हुई,मैंने कहा कि अगले महीने मैं खुद आपको फ़ोन कर लूंगी I शाहरूख साब बहुत ज़हीन हैं ,तुरंत समझ गए कि फ़ोन देने में मुझे हिचक है तो मुकुराती आवाज़ में  बोले ठीक है! अगले महीने मिलते हैंI
अगला महीना कभी नहीं आया I शाहरूख साब एक्टिंग के ही नहीं किस्मत के भी बादशाह निकले Iकुछ दिन बाद ही उन्हें दिल आशना है ,चमत्कार और  दीवाना जैसी सुपर हिट फिल्मे मिल गयी Iवे इतने बड़े हो गए कि टीवी का स्क्रीन उनके लिए बहुत छोटा रहा गया Iपर यह ज़रूर है की उन्होंने बास्केट बॉल खेला ,टीवी पर ना सही ‘कुछ-कुछ होता है’ फिल्म में ही सही I
क्लास में स्टूडेंट्स ने youtube से हैरी मेट सेजल का गीत डाउनलोड कर गाना चला दिया था जिसके कारण मैं स्मृतियों को झटक कर वर्तमान में आ गयी थी I शाहरुख़ और अनुष्का यात्रा में है और यह गाना उन दोनों की भीतर की यात्रा भी दर्शा रहा था जिसमें वे दोनों अब टूरिस्ट और गाइड  न रहकर सहयात्री हो गए थे I
सच में मंजिलों से ज्यादा यात्रायें ज्यादा मोहक होती हैं Iगीत बहुत खूबसूरत फिल्माया गया था -प्राग की धुंधलाती शाम.. किसी का साथ-साथ चलना..कहना कुछ नहीं ,पर महसूस बहुत कुछ करना I एक दूसरे को चोरी से देखना ,नज़रें मिलने पर इधर-उधर देखने लग जाना Iमुझे भी कुछ ऐसी ही शामों की याद दिला रही थीI अनजाने रास्तों को ढूँढना ,और खूब चलते जाना, चायपीने के लिए जिद करना और न मिलने पर झूठ-मूठ का नाराज़ होना I पर सबमें आनंद था,इतना आनंद कि आज भी याद करके भीतर कुछ अच्छा सा महसूस होने लगता है I
यह सच है कि जीवन की यात्रा में कितने लोग मिलते हैं पर वक़्त की हवाएं न जाने किन अनजान रास्तों पर ले जाती हैIऔर एक समय पर किये गए मज़बूत वायदे हवा के एक अनजान झोंके से कागज़ की तरह उड़ जाते हैं I पर यह ज़रूर है कि वे तमाम स्मृतियाँ मन में ही कही अँधेरे में होती हैं और ज़रा सी रौशनी मिलने पर फिर से टिमटिमाने लगती हैं ....कहीं आनंद बनकर तो कभी टीस बनकर !
बेगानी है हवाएं..हवाएं हवाएं / ना जाने कहाँ ले जाएँ हवाएं..हवाएं हवाएं !


‘अरे! टाइगर तो फिर भी 1400 है, पर तुम तो बस इकलौती ही हो !’/ स्मिता मिश्र


गोवा एयरपोर्ट से उतर कर कार में बैठी हूँ । फरवरी में दिल्ली की भारी ठंड और घने कोहरे के कारण फ्लाइट की लेट लतीफी से जूझ कर डबलिन एयरपोर्ट से केनकून जा रही हूं। वहीँ ‘अगोंडा बीच’ पर सैंडी फीट रिसोर्ट में बुकिंग है।
डबलिन एयरपोर्ट से लगभग 70 किमी दूर है यह जगह। कोस्टल लाइन है यह। बेहद खूबसूरत। घने नारियल और काजू के पेड़ों से लबालब रास्ता। और साथ में हहराता समुद्र। अनायास गुनगुना उठी.....
समन्दर.. समन्दर.. यहां से वहां तक/ ये मौजों की चादर बिछी आसमां तक..
यार! ये भी कैसा शहर है। खामोश.. केवल प्रकृति ही बात करती है। समन्दर बात करता है। नारियल और काजू के पेड़ आपस में बात करते हैं। ठंडी हवाएं समुद्र की लहरों से हिल-मिल कर बात करती हैं। अद्भूत सौंदर्य बाहर का सौंदर्य जितना है उससे ज्यादा उस सौंदर्य को अपने में समाते जाना, उसे अपने में पीते जाना।
गोवा का भूगोल उत्तरी गोवा और दक्षिणी गोवा में बंटा हुआ है। । इन दोनों गोवा के बीच तकरीबन 60-70 कि.मी. की दूरी है। गोवा की राजधानी पंजिम उत्तरी गोवा में होने के कारण तमाम हलचले उत्तरी गोवा में अधिक रहती हैं। भारतीय पर्यटक उत्तरी गोवा में अधिक जाते हैं जबकि भीड़-भाड़ और कोलाहल से दूर शांति तलाश करने वाले दक्षिणी गोवा जाते हैं।
फिलहाल मैं दक्षिणी गोवा जा रही थी जोकि एअरपोर्ट से 70 किलोमीटर दूर हैI कार आगे बढती जा रही थी और मैं स्मृतियों में पीछे I पिछले दिनों दिल्ली में भारी दिनचर्या के कारण मन बहुत थका- थका सा चल रहा था I इसलिए जब गोवा में अंतरराष्ट्रीय फिल्म सेमिनार में शिरकत की बात आई तो लगा कि मेरे लिए यह ब्रेक हो सकता है। इसलिए कर ली तैयारी ‘गोवा’ की।
गोवा सुनते ही एक ऐसे शहर का एहसास होता है जो प्रेम या तथाकथित प्रेम के खुलेपन के लिए जाना जाता है I मौज-मस्ती, खुलापन, समुद्र के बीच, अंग्रेज, चर्च और फेणी ऐसे ही कुछ शब्द अमूमन गोवा को परिभाषित करने के लिए प्रयोग होते हैं। इसलिये जितने लोगों को भी मेरे गोवा जाने का पता चला ,वे बहुत सांकेतिक हँसी हँसते और आँखे तिरछी करके पूछते ---ओहो ! किसके साथ जा रही हो ? जब उन्हें पता चलता कि मैं अकेले ही जा रही हूँ तो बोलते –चल झूठी ! गोवा भी कोई अकेले जाने की जगह है।
कुछ आत्मीय ऐसे हैं जिन्हें मेरे स्वभाव का कुछ-कुछ अंदाज़ा तो है, पर मैं इतनी पागल हूँ ,ये उनके लिए भी थोडा पचाना कठिन हो गयाI हैरानी से मुँह खोलकर मुझे देखा और फिर पूछा –क्या वाकई अकेले जा रही हो ! मैंने सहमति में सिर हिलाकर कहा- सेमिनार है न ! अच्छा—अच्छा ! फिर तो सेमिनार की जगह ठहरोगी .मैंने कहा –नहीं! दो दिन तो समुद्र तट पर ही बम्बू -हट बुक की है I आगे का फिर वहां पहुँच कर देखूँगी I
‘हे भगवान् !क्या विचित्र प्राणी हो तुम भी ! सरकार को टाइगर नहीं, तुम्हे संरक्षित करने की कोशिश करनी चाहिए I वे तो फिर भी 1400 हैं ,पर तुम तो बस इकलौती ही बची हो !
सब हँसते तो उनकी हँसी के साथ मैं भी हँस देती I पर यह सच है कि मैं स्टीरियोटाइप कभी नहीं रही। न कभी प्रचलित आइडियोलॉजी के चक्कर में पड़ी न कभी प्रचलित फैशन के । अपने ढंग से, अपनी ही धुन से अपनी जिंदगी को जाना और जिया है। मन में कोई लाग लपेट नहीं रखी,जो सहज लगा वही किया। जो लोग सहज प्रेम से मिले,उनसे जुड़ गयी I खैर. तमाम हास-परिहास और कौतुक को परे छोड़ अपने प्रेजेंटेशन पर ध्यान दिया क्योंकि विषय मेरे माकूल था- Gender & Hindi Cinema.
यादों का सिलसिला ड्राईवर ने तोड़ दिया I Ma’am,You have reached. कार सैंडी-फीट होटल तक पहुंच गई। वाकई यह तो सैंडी फीट है। समुद्र तट पर बम्बू की छोटी-छोटी खूबसूरत हट्स बनी हुई और मेरी हट तो एकदम बीच पर है। अहा! अद्भूत! देखा उस रिसोर्ट में सभी नंगे पाव ही घूम रहे हैं क्योंकि वहां रेत ही रेत फैली है। अपनी ‘कुटिया’ में सामान रखकर बाहर आकर रेत में बैठ गई और निहारने लगी समुद्र को। दूर-दूर तक एकदम साफ और सुंदर समुद्र तट। तमाम विदेशी पर्यटक अपने “खुलेपन” में समुद्र का आनंद ले रहे थे । कोई लेटा हुआ, कोई लेपटॉप लेकर बैठा हुआ, कुछ जोड़े समुद्र में काफी अंदर लुत्फ ले रहे थे। मैं चाय लेकर रेत पर ही बैठ गई और अस्ताचल सूर्य को आंखों में उतारने की कोशिश करने लगी।
महानगर की आपाधापी, निजी जीवन के उतार-चढ़ाव, प्रोफेशनल लाइफ के चक्र-कुचक्र से परे मन एकदम शांत हो गया था। समुद्र की किनारे की ओर आती प्रत्येक लहर ऐसा लग रहा था कि मुझ तक आ रही है और मेरे मन की एक-एक हलचल को शांत करती हुई वापिस जा रही है।
उस रिसार्ट में मुझे छोड़कर वहां सब विदेशी थे और सभी जोड़े थे । उसी रिसोर्ट में क्यूं लगभग सभी रिसोर्ट में इका-दुक्का ही भारतीय पर्यटक होंगे। इसके दो कारण है एक तो यह भारतीयों के लिए छुट्टियों का सीजन नहीं है और दूसरे दो दिन बाद यहां विधानसभा चुनाव भी था ।
अगर यह फिल्म सेमिनार न होता तो शायद मैं भी न आती। वहीं बैठे-बैठे शाम की घुंध अब रात में बदल गयी। मैं बैठे-बैठे रेत पर पसर गई थी। हाथों का तकिया बनाए आसमान देखने लगी। चांद तो खूब चमक रहा और साथ में ‘ध्रुव तारा’ दपदप हो रहा था। दिल्ली में इतना साफ आसमान नहीं दिखा कभी। साफ की क्या बात करूं इतना सारा आसमान ही नहीं दिखा। ऊंची-ऊंची बिल्डिंगों में सूरज और चांद दोनों ‘गुम’ हो गए हैं जैसे। किसी लड़की के लिए आसमान देखने की चाह कितनी दुर्लभ है,यह वहां मुझे पता चला I
‘मैम आप डिनर में क्या लेना चाहेंगी बैरे ने आकर पूछा! मैंने हंसते हुए कहा की भूख तो लगी है पर खाना यहीं चाहिए । उसने भी मुस्कुराते हुए वहीं गद्दियां और टेबल लगा दी। यह तो मेरे आनंद की पराकाष्ठा हो गई। लेकिन यह आनंद ज्यादा नहीं टिका जब उसने खाने का मैन्यू दिया तो उसमें तो कोई भी भोजन मेरी जान पहचान का न था। इस्रायली, जापानी, थाई, योरोपीयन, रूसी सभी थे,पर भारतीय नहीं था । मैंने उससे पूछा कुछ शाकाहारी है तो दे दो उसने कहा- थोडा समय दीजिये ,अभी बनाते हैं I वाह! क्या बात है।
खा-पीकर अपनी हट में आकर सोने की कोशिश करने लगी। बम्बू हट वाकई सुंदर थी। हालांकि केवल बम्बू की दीवारें थी और छत पर केवल बम्बू ही लगे थे जिसमें से समुद्री हवा सीधे अंदर घुस रही थी। यह मेरे लिए पहला अनुभव था समुद्र के इतने निकट रहने का। रात बढ़ने के साथ लहरें भी बढ़ती हैं। उन की आवाज़ पास से पास, फिर और पास आने लगी। रात को समुद्र का पानी बढ़ता है। थोड़ा डर भी लगा पर डर ज्यादा देर तक नहीं रहा क्योंकि इतनी थकी हुई थी कि झट से नींद आ गई। ऐसा सोई कि सुबह 6 बजे ही जागी। अभी भी घुप्प अंधेरा था।
नया-नया मैंने योग सीखना शुरू किया थाI दिल्ली में मेरी योग गुरु विजया जी ने कहा कि मैम! गोवा में भी अभ्यास करना . उनकी बात याद आ गई इसलिए समुद्र तट पर प्राणायाम शुरू किया। आँख बंद कर अभ्यास करती रही ,आँख खुली तो आसपास का नज़ारा देख कर घबरा गयी I देखा मेरे आस-पास अनेक फिरंगी बैठकर प्राणायाम कर रहे हैं। मुझे देख कर मुस्कुरा दिए और कहने लगे we love to learn yoga . मैं मुस्कुरा दी और मन ही मन कहा –जय बाबा रामदेव ! उन्हें मैंने समझाया कि I am learner, not an instructer.पर वे तो मुझे गुरु मान ही बैठे थे,इसलिए मुझे अपना योग-ज्ञान उडेलना ही पड़ा Iसमस्या यही ख़त्म नहीं हुई क्योंकि उन्होंने आगे के कई दिनों तक मुझसे रोज़ प्राणायाम सिखाने का वायदा भी लिया I
पर फिलहाल अपने अभी-अभी बने शिष्यों को योग महिमा समझा कर मैं समुद्र-बीच पर आगे बढ़ी I बीच पर खूबसूरत या फिर खूबसूरत की श्रेणी में नहीं आने वाली तमाम फिरंगी लड़कियां और औरते काफी खुलेपन से घूम रही थी। यह खुलापन देखकर एहसास हुआ कि क्यों भारत के ‘भद्र-पुरुष पर्यटक’ यहां ज्यादा आते हैं और यहां आने के बाद अपने घरवालों के ‘फोन’ भी नहीं उठाते हैं। खैर.. मैंने थोड़ी देर बीच-फुटबाल और बीच-क्रिकेट का आनंद लिया, फिर उठ ली शहर देखने के लिए I
मुझे शहर की सुबह और शाम दोनों ही मिजाज देखने होते हैI पैदल ही गलियों में घूमने लगी। छोटी-छोटी घुमावदार सड़के साफ-सुथरी, पुर्तगाली प्रभाव के मकान..इन सबको देख कर ऐसा लग रहा था कि मैं मानों मध्य कालीन योरोप के समय में हूं। बच्चे स्कूल ड्रैस में सजे हुए, स्कूल जा रहे थे। फिरंगियों के लिये जगह-जगह योगा केंद्र बने हुए थे । तमाम औरते गजरा लगाए हुए सब्जी बेच रही थी या सड़क सफाई कर रही थी।
सोचा चाय पी जाये और कुछ लोकल खाया जाये I एक छोटी सी चाय की दूकान खुली थी I अपन जा कर एक बेंच पर जाकर बैठे और देखने लगे कि लोग क्या खा रहे हैं I चाय-समोसा स्थानीय लोगों की पसंद थी I तभी मेरे सामने तकरीबन साढ़े छह फुट लम्बा एक खूबसूरत फिरंगी आकर बैठ गया Iबहुत सधा और कसा हुआ शरीर! उसकी शक्ल हॉलीवुड हीरो जॉर्ज क्लूनी से काफी मिलती जुलती थी I हो सकता है कि जॉर्ज क्लूनी ही हो! यहाँ तो सब आते रहते हैं I अरे जो भी हो अपन को क्या करना Iउसने मुझे देखा और मुस्कुराया I दरअसल जब लन्दन में थी तो मुझे ये अंदाज़ा हुआ था कि ये अँगरेज़ लोग जब भी किसी को देखते है तो सौजन्यतावश मुस्कुराते हैं I अगर भारत में कोई पुरुष किसी स्त्री को देख कर वैसे ही मुस्कुरा दे तो बेचारा पिट जाएगा I
मैंने देखा उसने आर्डर किया रगडा-पैटीज़ ! नाम बहुत हिंसक सा था पर देखने में देखने में उतना ही स्वादिष्ट लग रहा था इसलिए मैंने भी वही आर्डर कर दिया I चाय पीते-पीते बातचीत शुरू हुई तो पता चला कि वह अमेरिकन प्रोडक्शन कंपनी में सिनेमाटोग्राफर हैI इसी सिलसिले में भारत आना हुआ और कई महीनो से वहीँ है I अपन जहाँ जाते हैं अपने ही प्रोफेशन के लोग मिलते जाते हैंI चाय पीते पीते उसने पुछा कि मैं यहाँ कैसे आई ,तभी मुझे याद आया की मैं तो सेमिनार में आई हूँ,और बस एक घंटा रह गया है उसके शुरू होने में I अपन निकल लिए फ़टाफ़ट हिंदी सिनमा में स्त्री की सुगति- दुर्गति पर अपनी बात कहने के लिए I
सेमिनार चाहे देशी हो या विदेशी,बातें तो होती रहती हैं पर मेरे लिए तो लोगों से मिलना बहुत महत्वपूर्ण होता है Iयहाँ भी जहाँ कलकत्ता विश्वविद्यालय की ममता ,JNU की विभावरी ,मुंबई के मनीष और ओमप्रकाश ,गोवा के प्रमोद जैसे लोगों से जान-पहचान हुई ,वहीँ पुरानी परिचित रायपुर की सुभद्रा राठौर से भी मुलाकात हुईI भारतीय ,कनाडा ,फ्रांस ,ऑस्ट्रेलिया आदि के फिल्म कलाकारों से मिलना भी ठीक ही रहा I
पर सर्वाधिक सुखद रहा ममता और विभावरी के साथ गोवा की सड़कें छानना ,विचित्र नामों वाले कोल्ड ड्रिंक पीना , हम तीनों का अपने -अपने जीवन अनुभवों का निर्भय होकर साझा करना ... और.. और.. और.. किसी की परवाह किये बिना हँसते जाना और हँसते जाना Iसच में गोवा मैं आई ज़रूर अकेली थी पर वापिस अकेली नहीं जा रही हूँ Iकुछ मज़बूत दोस्ती साथ ले जा रही हूँ I

Wednesday, 26 April 2017

बना रहे बनारस


https://www.youtube.com/watch?v=2GogD_bURX0


बनारस यूं तो कई चीजों के लिए प्रसिद्ध है। चाहे वह उसका पान हो, मंदिर हो या घाट। पिछले दिनों बनारस में कुछ दिन बिताने का मौका मिला। जिस कार्य के लिए गया था उसका परिणाम तो सकारात्मक नहीं आया लेकिन इसी बहाने बनारस घूमने का मौका मिल गया। एक बात और जब आप घूमने जाए तो सिर्फ घूमिए उस दौरान कार्य के लिए शूट करने लगे तो फिर आप पूरे आनंद के साथ घूम नहीं पाएंगे। कुछ ऐसा हुआ मेरे साथ। चूंकि बहुत कम समय के लिए गया था तो घूमना और शूट दोनों करना था। शायद इसी कारण मैं पूरे आनंद के साथ नहीं घूम पाया। पर इस बात की खुशी भी है अपने दर्शकों के लिए मैं कुछ वहां से कुछ ले आने में सफल हो गया। 
बहरहाल वहां पहुंचने के दिन की शाम को मैं और मेरे मित्र बनारस के घाट घूमने निकले। हम लोग सीधे तुलसी घाट पहुंचे। वहां से अस्सी घाट ज्यादा दूर नहीं हैं। तुलसी घाट के बारे में कहा जाता है कि यहां गोस्वामी तुलसी दास से रामचरित मानस के कुछ अंशों की रचना की थी। यह केवल तुलसी दास घाट के बारे में नहीं है। हर घाट के बनने की अपनी कहानी है। उससे जुड़े रिति-रिवाज हैं। घाटों को इस प्रकार बनाया गया है कि आप सारे घाटों को आसानी से एक साथ घूम सकते हैं। सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। 
घाटों पर गंगा में स्नान करते लोग, पूजा की सामग्री बेचते लोग, पूजा से इतर सामग्री बेचते लोग, पर्यटक और हम जैसे वेल्हे लोग आसानी से मिल जाते हैं। यहां ऋद्धालुओं की एक अलग जमात देखने को मिलती है। चूंकि बनारस महादेव की नगरी है तो उसका प्रसाद माने जाने वाले गांजे का सुट्टा लगाते हुए लोग घाटों पर आसानी से मिल जाएंगे। इसमें विदेशी भी शामिल होते हैं। मुझे हमेशा लगता है कि गांजा पीना सिगरेट पीने से साइक्लोजिकली ज्यादा आसान है। क्योंकि सिगरेट पर इसके हानिकारक होने की घोषणा की हुई होती है। जिससे आप कहीं न कहीं मानसिक रूप परेशान रहते हैं जबकि गांजे को महादेव का प्रसाद मानने के कारण वह मानसिक परेशानी कम हो जाती है।   
आज कल घाट काफी साफ-सुथरे हो गए हैं। बनारस के घाट कई फिल्मों में भी आपको देखने को मिल जाएंगे। जैसे मसान, काशी का अस्सी और बेंजामिल बॉटम, द रिबाउंड है। इनमें से कई फिल्मों की पृष्ठभूमि ही घाट की थी तो कुछ में एक-आध दृश्यों दिखाए गए थे। मणिकर्णिका घाट के बारे में कहा जाता है कि यहां कि अग्नि कभी शांत नहीं होती। यहां लगातार अंतिम संस्कार होते रहते हैं। और माना जाता है कि यहां हुआ अंतिम संस्कार आपको सीधे स्वर्ग ले जाता है। शायद यही कारण है कि लोग यहां मरने की उम्मीद लेकर आते हैं।

Friday, 24 March 2017

ना मानेगो ? तो जे ले राधा जी की गुलेल !! #vrindavan # Travelogue




ना मानेगो ? तो जे ले राधा जी की गुलेल !!


आज का दिन भी दौड़ा-दौड़ा भागा-भागा सा है। कॉलेज में स्टाफ एसोसिएशन का होली मिलन है। शाम को उपराष्ट्रपति के घर महिला पत्रकार डेलीगेशन में जाना है। फिर अपनी शाम वाली क्लास है। हमने घड़ी देखी और कर दी रेस शुरू।

आज क्या पहनूँ.. क्या पहनूँ.. इसी उधेड़बुन में थी। उपराष्ट्रपति के यहाँ  जाना है तो थोड़ा औपचारिक ड्रेस होना चाहिए यानी साड़ी। अब संकट यह कि कौन सी पहनूं। अनेक साड़ियों पर से हाथ गुजरते हुए एक साड़ी पर जाकर हाथ रूक गया जोकि तमाम साड़ियों के पीछे से झांक रही थी। नीले रंग की हैदराबादी कॉटन साड़ी और बीच में कलमकारी का काम। इस साड़ी पर हाथ भी रूक गया और मन भी थम सा गया। यह साड़ी उसकी पसंद थी न! खैर सिर झटका। देर हो गई है भागो।
शुक्र है ड्राइवर साब टाइम से आ गए। गाड़ी शुरुआती जाम के बाद हाइवे पर। आज बउआ जी को सुनने का मन नहीं थी। कई बार सुबह-सुबह टेंस कर देते हैं। आज थोड़ा पुराने गीतों की ओर चलते हैं यानी एक एफएम स्टेशन पीछे 92.7 गाना बज उठा आज बिरज में होली से रसिया, होली रे रसिया, बरजोरी रे रसिया। मैं भी गुनगुनाने लगी।
तभी हमारे जानकार पंडित भानुप्रतान नारायण मिश्र (नाम लंबा है और यश भी) का फोन आ गया। मैंने जैसे ही फोन उठाया उधर से आवाज आई- भाग्यलक्ष्मी! गणेश जी की कृपा से हम वृंदावन में विराज रहे हैं। पंडित जी पत्रकार भी हैं और ज्योतिषी भी। गणेश जी की भक्ति में सराबोर पंडित जी के राजनीति से भी गहरे संबंध रहे हैं। वे मुझे भाग्यलक्ष्मी बुलाते हैं क्योंकि उनका मानना है कि मैं जब-जब उनसे मिलती हूं तो उनके लिए लाभदायक स्थितियां बनती हैं। वैसे अनेक लोग मुझसे यह कहते हैं कि मैं उनके लिए भाग्यशाली हूं। मेरे संपर्क में आने से उन्हें सफलता मिलती है। पता नहीं यह विश्वास कहां तक सच है। पर मेरे लिए यह सौभाग्य की बात है कि मैं लोगों की सफलता का निमित्त बनती हूं।
पंडित जी के फोन और लगातार बजते होली के गीत से मन में ख्याल आया और उस ख्याल का परिणाम था कि अगले दिन सुबह 5 बजे हमारी कार वृंदावन के लिए निकल पड़ी। हर साल टीवी पर ब्रज की होली के बारे में सुनती हूं और सुनकर आनंद लेती हूं। इस बार वहीँ जाकर आनंद लूंगी।

पिछली रात जमकर बारिश हुई थी, ओले पड़े थे तो सुबह सर्दी थी। मार्च के मौसम में भी कार में हीटर चलाना पड़ा था। रास्ते में अखबार खरीदा,देखा दैनिक हिन्दुस्तान के पत्रकार और मेरे आत्मीय विद्यार्थियों में से एक अमित की लठमार होली की बहुत आकर्षक और सार्थक फोटो प्रकाशित हुई थी, जिसमें एक औरत लठ लेकर सड़क के बीच चल रही थी और दूसरी और पुरुषों की पूरी कतार खड़ी उसे देख रही थी।महिला दिवस पर सार्थक चित्र !
ब्रज क्षेत्र में होने का एहसास रंगे-पुते चेहरे देखकर होने लगा। खैर अपन पहुंच गए वृंदावन। सर्वप्रथम दर्शन करने थे बांके बिहारी मंदिर में।पतली-पतली गलियों से गुजरते हुए भक्ति और फागुन की मस्ती में आह्लादित भक्तों के झुंड के झुंड मिलने लगे। एक ओर गुलाल, पेड़े-मिठाई की, प्रसाद सामग्री बेचने वालों की दुकाने थीं तो दूसरी ओर साधुओं की और विधवाओं की कतार थी। यानी संसार के भीतर वालों की और संसार से परे वालों की थी।

ज्यों-ज्यों गलियों के भीतर में धंसती जा रही थी त्यों-त्यों फागुनी हवा मेरे भीतर धंसती जा रही थी और एक बेफिक्री सी आ रही थी। वृंदावन पिछले साल भी दोस्तों के साथ आना हुआ था। इन्हीं गलियों से दोबारा गुजरना हो रहा है। नैन्सी ! याद है न! चाट, कुल्हड़ में दूध और तेरा एक्सक्लुसिव फोटो शूट। फिलहाल अभी तमाम देशी-विदेशी टीवी चैनलों के फोटोग्राफर रंगे-पुते इस समय वृंदावन में छाए उल्लास को कैमरे में कैद कर रहे थे। विदेशी फोटोग्राफर के फोकस के केंद्र में साधु-विधवाएं ज्यादा थी। जबकि भारतीय फोटोग्राफर मस्ती के रंग में रंगे जीवन को अधिक कैप्चर कर रहे थे।
पिछले साल जब आई थी तो मैं सुबह 5 बजे का वृंदावन देखने निकल पड़ी थी। शांत था एकदम शहर, ऐसे में मंदिर जाती साधू और विधवाएं ही दिख रहीं थीI वृंदावन फिरते हुए चाय पीने की इच्छा हुई थी। सड़क किनारे एक चाय की दुकान खुली थी। वहां सड़क के किनारे कुर्सी खींचकर में बैठ गई। एक छोटा सा बंदर मेरी कुर्सी के साथ लगे खंभे पर चढ़कर शोर मचाने लगा। शायद कुछ खाने के लिए दुकानदार से कुछ मांग रहा था। मैं थोड़ी भयभीत सी हुई और कुर्सी इधर-उधर की। चायवाले ने उससे ऐसे बात करते हुए कहा मानो  इनसान से बात कर रहा हो- रे! न मानेगो। ब्रज शैली में कही गई यह बात मानो बंदर के समझ में आ गई। उसने शर्मिंदा होते हुए मुझसे थोड़ी दूरी बना ली। पर तब तक और बंदर भी आ गए थे। तब दुकानदार ने सहज रूप से उससे कहा- न मानेगो? तो जे ले राधा जी की गुलेल। यह कहते हुए उसने एक गुलेल निकाली और बंदरों को दिखाई। ओहो हो... गुलेल देखते ही बंदरों में जैसे हड़कंप मच गया। सड़क के इधर के बंदर हो या सड़क के पार दूसरे बंदर, सबमें भगदड़ मच गई। छोटे बंदर, बड़े बंदर, मोटे बंदर, पतले बंदर जिसको जहां जगह मिली भागने लगा। बड़े बंदर कूद-कूद कर बिल्डिंग के ऊपर चढ़ बैठे। छोटे-छोटे बचुनिया जैसे बंदर बेचारे भाग नहीं पाए तो सड़क के किनारे खड़ी रेहड़ियों के पीछे छिप गए। एकदम इनसानों जैसे व्यवहार। एक तो गुलेल फिर राधा जी के नाम का महात्म्य.. भगदड़ तो मचनी थी। राधा जी जब कृष्ण को नहीं छोड़ती थी तो फिर ये बेचारे बंदर किस गिनती में है। अब मुझे लग रहा था कि जो लोग अभी होटल में सो रहे हैं कैसे अद्भुत दृश्य से वंचित रह गए।
खैर इस बार की वृंदावन यात्रा में माधव जी हमारे गाइड थे। 18-19 साल का लड़का लेकिन वाक्पटुता भरी हुई। मैडम जी। पाकिस्तानी आतंकवादी और वृंदावन के बंदरों का कुछ पता नहीं कि कब, कहां से आ जाए। सीसीटीवी से बच जाओगी इनसे नहीं। इसलिए अपना चश्मा बैग के अंदर रखिए, बंदर आपकी रेकी कर रहे हैं। मैंने झट से चश्मा बैग के अंदर रखा पर बंदरों का चश्मे से लगाव का कारण समझ नहीं पायी।
निधिवन घुमाते हुए गाइड माधव ने  बताया कि यह प्रेम का स्थान है। इसलिए ताली बजाओं और हंसो। ताली बजाना और हंसना यानी आनंद महसूस करना। अद्भुत स्थान है निधिवन भी । कृष्ण की रासलीला की भूमि कृष्ण की जितनी गोपियाँ उतने ही वृंदा और वह भी जोड़े में। वृंदा यानी तुलसी। प्रेम भी विचित्र शब्द है। असली दुनिया में कितना वर्ज्य माना जाता है लेकिन ईश्वर से जुड़कर पूज्य बन जाता है। भक्त आते हैं और भगवान की रासलीला के स्थान की धूल माथे पर लगाते हैं। 

धर्म एक ओर जहां अर्थ और काम से मोक्ष की ओर जोड़ता है वहीं धर्म के प्रतीक ये मंदिर न जाने कितने जीवन के आर्थिक आधार बनते हैं। तमाम भक्तो के आने से धार्मिक पर्यटन बढ़ता है। पूजा-सामग्री, प्रसाद, फूल, मूर्तियां, स्मृति चिन्ह, खाने-पीने, होटल, धर्मशालाएं, गाइड, यातायात, रियल-स्टेट न जाने कितनी-कितनी जीविकाएं आम लोगों के लिए खुलती जाती हैं। एक ओर धर्म से दुनिया से परे ले जाने का कार्य तो सधता ही है, दुनिया में जीने के लिए भी साधन धर्म जुटाता है। यानी आध्यात्मिकता और भौतिकता दोनों का कार्य धर्म से सधता है। वाह! हांलाकि यही शब्द दुनिया में तमाम उठापटक का भी कारण हैं। धर्म जीवन-पद्धति है, कर्तव्य है। इससे परे कोई तीसरा अर्थ कम से कम मुझे समझ नहीं आता है। परहित सरिस धरम नहीं माई।/ पर पीड़ी सम नहीं अधमाई। तुलसीदास ने कितने सहज रूप में धर्म को व्याख्यायित कर दिया फिर भी दुनिया धर्म को लेकर लड़े जा रही है। दरअसल जो चीज जितनी सहज दिखती है उसे अपनाना उतना ही कठिन होता है। देखा वृंदावन का प्रताप। मेरे जैसे घुमक्कड़-फक्कड़ भी  दार्शनिक हो गया।

अभी बांके बिहारी जी के शाम के दर्शन में दो घंटे की प्रतीक्षा थी। तय किया कि मंदिर के प्रांगण में बैठकर ही शाम के 4:30 बजे की प्रतीक्षा की जाए। मंदिर के मुख्य द्वार के सामने ही बैठकर लोगों को देखने का आनंद लेने लगी। तभी याद आया कि लोगों के फोन और एसएमएस आ रहे थे। जिनका जवाब नहीं दे पा रही थी। अभी समय है चलो स्टेटस अपडेट कर दूं फेसबुक पर। ताकि लोगों को पता चल जाए कि मैं दिल्ली में नहीं हूं। कुछ फोटो फेसबुक पर डाल दी। अभी लंबा-चौड़ा लिखने का समय नहीं था तो दो-तीन फुटकर लाइनें लिख कर कुछ फोटो डाल दी। तब तक राधे-राधे करते भक्त मंडली मस्ती में झुमने लगे। सामूहिकता में कितना आनंद होता है। यह सुर और बेसुरा का प्रश्न नहीं था बस सामूहिकता की लय थी। और उसी में आनंद था। ढोल, नगाड़े वाले भी मस्त और अपन भी मस्त।सबसे खूबसूरत बात यह कि इतनी भीड़ इतनी मस्ती पर कहीं भी बेहूदगी नही देखी। गुलाल ही गुलाल, मस्ती ही मस्ती। राधा कृष्ण की नगरी जो है।
अभी एक घंटा रहता था कपाट खुलने में। बाहर भक्तों के घोष ऊंचे से ऊंचे होते जा रहे थे। बोल बांके बिहारी महाराज की जय। ऐसा लगा भक्तों की घोष ने बांके बिहारी जी भी स्थिर न रह सके और कपाट पहले ही खोल दिए गए।कपाट खुलते ही भक्तों का समुद्र भीतर बह चला- अंदर जैसे ही पहुंचे अद्भुत, अवर्णनीय दृश्य। लाल-गुलाबी गुलाल आसमान पर छाए हुए। सब बांके बिहारी के साथ होली खेलना चाह रहे थे। और बांके बिहारी जी की काले रंग की मूर्ति गुलाबी आभा से दमक रही थी। जीवन का सार, ध्येय, लक्ष्य आदि शब्द यहीं आकर समाप्त हो जा रहे थे। मोक्ष और क्या होता है। शायद यही.. यही.. यही..।  अपन तो आनंद से छक लिए। आने से पहले तो बहुत कुछ था मन में, पर अब मन में केवल आनंद! अपनी होली तो हो ली भई!!!
अब कुल्हड़ की चाय पी जाए और चाट खाई जाए अहा! चाय पीते-पीते फोने पर फेसबुक नोटीफिकेशन आने लगे,देखा की मेरी पोस्ट को  बहुत प्रतिक्रियाएं आ गयी हैं, कुछ ने  आश्चर्य जाहिर किया था तो कुछ ने शिकायत की थी कि मैं उन्हें नहीं लेकर गई। कुछ ऐसे थे जिन्होंने पढ़ा तो,कुछ कहना भी चाह होगा पर लाइक करके ही छोड़ दिया !
दरअसल यात्रा करना तो सब चाहते हैं पर यात्रा की चुनौती लेना सबके बस की बात नहीं। कुछ लोग यात्रा की इतनी प्लानिंग करते हैं कि वह यात्रा होती ही नहीं। मेरे लिए लाइफ हो या यात्रा बहुत ‘इफ’ और ‘बट’ नहीं है। बहुत सीधा और सहज सोचने वाली व्यक्ति हूं। इसलिए तमाम लोगों के ‘इफ’ और ‘बट’ की query से जूझने का माद्दा नहीं है मुझमें। उसमें यात्रा का आनंद ही समाप्त हो जाता है। यात्रा शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाती है।
अपन तो मन में आया, तो विचार बनाया, थोड़ा गूगल किया और निकल पड़े। इस उद्देश्य के साथ Lets Explore.............!

Asmi




भाषा और समाज /अविचल गौतम(ivth sem)

एम।फिल।(भाषा प्रौद्योगिकी) मेरी दृष्टि से भाषा मात्र मनुष्य के मनुष्य होने की पहचान और शर्त है। भाषा के बिना मनुष्य नहीं...