Friday, 24 March 2017

ना मानेगो ? तो जे ले राधा जी की गुलेल !! #vrindavan # Travelogue




ना मानेगो ? तो जे ले राधा जी की गुलेल !!


आज का दिन भी दौड़ा-दौड़ा भागा-भागा सा है। कॉलेज में स्टाफ एसोसिएशन का होली मिलन है। शाम को उपराष्ट्रपति के घर महिला पत्रकार डेलीगेशन में जाना है। फिर अपनी शाम वाली क्लास है। हमने घड़ी देखी और कर दी रेस शुरू।

आज क्या पहनूँ.. क्या पहनूँ.. इसी उधेड़बुन में थी। उपराष्ट्रपति के यहाँ  जाना है तो थोड़ा औपचारिक ड्रेस होना चाहिए यानी साड़ी। अब संकट यह कि कौन सी पहनूं। अनेक साड़ियों पर से हाथ गुजरते हुए एक साड़ी पर जाकर हाथ रूक गया जोकि तमाम साड़ियों के पीछे से झांक रही थी। नीले रंग की हैदराबादी कॉटन साड़ी और बीच में कलमकारी का काम। इस साड़ी पर हाथ भी रूक गया और मन भी थम सा गया। यह साड़ी उसकी पसंद थी न! खैर सिर झटका। देर हो गई है भागो।
शुक्र है ड्राइवर साब टाइम से आ गए। गाड़ी शुरुआती जाम के बाद हाइवे पर। आज बउआ जी को सुनने का मन नहीं थी। कई बार सुबह-सुबह टेंस कर देते हैं। आज थोड़ा पुराने गीतों की ओर चलते हैं यानी एक एफएम स्टेशन पीछे 92.7 गाना बज उठा आज बिरज में होली से रसिया, होली रे रसिया, बरजोरी रे रसिया। मैं भी गुनगुनाने लगी।
तभी हमारे जानकार पंडित भानुप्रतान नारायण मिश्र (नाम लंबा है और यश भी) का फोन आ गया। मैंने जैसे ही फोन उठाया उधर से आवाज आई- भाग्यलक्ष्मी! गणेश जी की कृपा से हम वृंदावन में विराज रहे हैं। पंडित जी पत्रकार भी हैं और ज्योतिषी भी। गणेश जी की भक्ति में सराबोर पंडित जी के राजनीति से भी गहरे संबंध रहे हैं। वे मुझे भाग्यलक्ष्मी बुलाते हैं क्योंकि उनका मानना है कि मैं जब-जब उनसे मिलती हूं तो उनके लिए लाभदायक स्थितियां बनती हैं। वैसे अनेक लोग मुझसे यह कहते हैं कि मैं उनके लिए भाग्यशाली हूं। मेरे संपर्क में आने से उन्हें सफलता मिलती है। पता नहीं यह विश्वास कहां तक सच है। पर मेरे लिए यह सौभाग्य की बात है कि मैं लोगों की सफलता का निमित्त बनती हूं।
पंडित जी के फोन और लगातार बजते होली के गीत से मन में ख्याल आया और उस ख्याल का परिणाम था कि अगले दिन सुबह 5 बजे हमारी कार वृंदावन के लिए निकल पड़ी। हर साल टीवी पर ब्रज की होली के बारे में सुनती हूं और सुनकर आनंद लेती हूं। इस बार वहीँ जाकर आनंद लूंगी।

पिछली रात जमकर बारिश हुई थी, ओले पड़े थे तो सुबह सर्दी थी। मार्च के मौसम में भी कार में हीटर चलाना पड़ा था। रास्ते में अखबार खरीदा,देखा दैनिक हिन्दुस्तान के पत्रकार और मेरे आत्मीय विद्यार्थियों में से एक अमित की लठमार होली की बहुत आकर्षक और सार्थक फोटो प्रकाशित हुई थी, जिसमें एक औरत लठ लेकर सड़क के बीच चल रही थी और दूसरी और पुरुषों की पूरी कतार खड़ी उसे देख रही थी।महिला दिवस पर सार्थक चित्र !
ब्रज क्षेत्र में होने का एहसास रंगे-पुते चेहरे देखकर होने लगा। खैर अपन पहुंच गए वृंदावन। सर्वप्रथम दर्शन करने थे बांके बिहारी मंदिर में।पतली-पतली गलियों से गुजरते हुए भक्ति और फागुन की मस्ती में आह्लादित भक्तों के झुंड के झुंड मिलने लगे। एक ओर गुलाल, पेड़े-मिठाई की, प्रसाद सामग्री बेचने वालों की दुकाने थीं तो दूसरी ओर साधुओं की और विधवाओं की कतार थी। यानी संसार के भीतर वालों की और संसार से परे वालों की थी।

ज्यों-ज्यों गलियों के भीतर में धंसती जा रही थी त्यों-त्यों फागुनी हवा मेरे भीतर धंसती जा रही थी और एक बेफिक्री सी आ रही थी। वृंदावन पिछले साल भी दोस्तों के साथ आना हुआ था। इन्हीं गलियों से दोबारा गुजरना हो रहा है। नैन्सी ! याद है न! चाट, कुल्हड़ में दूध और तेरा एक्सक्लुसिव फोटो शूट। फिलहाल अभी तमाम देशी-विदेशी टीवी चैनलों के फोटोग्राफर रंगे-पुते इस समय वृंदावन में छाए उल्लास को कैमरे में कैद कर रहे थे। विदेशी फोटोग्राफर के फोकस के केंद्र में साधु-विधवाएं ज्यादा थी। जबकि भारतीय फोटोग्राफर मस्ती के रंग में रंगे जीवन को अधिक कैप्चर कर रहे थे।
पिछले साल जब आई थी तो मैं सुबह 5 बजे का वृंदावन देखने निकल पड़ी थी। शांत था एकदम शहर, ऐसे में मंदिर जाती साधू और विधवाएं ही दिख रहीं थीI वृंदावन फिरते हुए चाय पीने की इच्छा हुई थी। सड़क किनारे एक चाय की दुकान खुली थी। वहां सड़क के किनारे कुर्सी खींचकर में बैठ गई। एक छोटा सा बंदर मेरी कुर्सी के साथ लगे खंभे पर चढ़कर शोर मचाने लगा। शायद कुछ खाने के लिए दुकानदार से कुछ मांग रहा था। मैं थोड़ी भयभीत सी हुई और कुर्सी इधर-उधर की। चायवाले ने उससे ऐसे बात करते हुए कहा मानो  इनसान से बात कर रहा हो- रे! न मानेगो। ब्रज शैली में कही गई यह बात मानो बंदर के समझ में आ गई। उसने शर्मिंदा होते हुए मुझसे थोड़ी दूरी बना ली। पर तब तक और बंदर भी आ गए थे। तब दुकानदार ने सहज रूप से उससे कहा- न मानेगो? तो जे ले राधा जी की गुलेल। यह कहते हुए उसने एक गुलेल निकाली और बंदरों को दिखाई। ओहो हो... गुलेल देखते ही बंदरों में जैसे हड़कंप मच गया। सड़क के इधर के बंदर हो या सड़क के पार दूसरे बंदर, सबमें भगदड़ मच गई। छोटे बंदर, बड़े बंदर, मोटे बंदर, पतले बंदर जिसको जहां जगह मिली भागने लगा। बड़े बंदर कूद-कूद कर बिल्डिंग के ऊपर चढ़ बैठे। छोटे-छोटे बचुनिया जैसे बंदर बेचारे भाग नहीं पाए तो सड़क के किनारे खड़ी रेहड़ियों के पीछे छिप गए। एकदम इनसानों जैसे व्यवहार। एक तो गुलेल फिर राधा जी के नाम का महात्म्य.. भगदड़ तो मचनी थी। राधा जी जब कृष्ण को नहीं छोड़ती थी तो फिर ये बेचारे बंदर किस गिनती में है। अब मुझे लग रहा था कि जो लोग अभी होटल में सो रहे हैं कैसे अद्भुत दृश्य से वंचित रह गए।
खैर इस बार की वृंदावन यात्रा में माधव जी हमारे गाइड थे। 18-19 साल का लड़का लेकिन वाक्पटुता भरी हुई। मैडम जी। पाकिस्तानी आतंकवादी और वृंदावन के बंदरों का कुछ पता नहीं कि कब, कहां से आ जाए। सीसीटीवी से बच जाओगी इनसे नहीं। इसलिए अपना चश्मा बैग के अंदर रखिए, बंदर आपकी रेकी कर रहे हैं। मैंने झट से चश्मा बैग के अंदर रखा पर बंदरों का चश्मे से लगाव का कारण समझ नहीं पायी।
निधिवन घुमाते हुए गाइड माधव ने  बताया कि यह प्रेम का स्थान है। इसलिए ताली बजाओं और हंसो। ताली बजाना और हंसना यानी आनंद महसूस करना। अद्भुत स्थान है निधिवन भी । कृष्ण की रासलीला की भूमि कृष्ण की जितनी गोपियाँ उतने ही वृंदा और वह भी जोड़े में। वृंदा यानी तुलसी। प्रेम भी विचित्र शब्द है। असली दुनिया में कितना वर्ज्य माना जाता है लेकिन ईश्वर से जुड़कर पूज्य बन जाता है। भक्त आते हैं और भगवान की रासलीला के स्थान की धूल माथे पर लगाते हैं। 

धर्म एक ओर जहां अर्थ और काम से मोक्ष की ओर जोड़ता है वहीं धर्म के प्रतीक ये मंदिर न जाने कितने जीवन के आर्थिक आधार बनते हैं। तमाम भक्तो के आने से धार्मिक पर्यटन बढ़ता है। पूजा-सामग्री, प्रसाद, फूल, मूर्तियां, स्मृति चिन्ह, खाने-पीने, होटल, धर्मशालाएं, गाइड, यातायात, रियल-स्टेट न जाने कितनी-कितनी जीविकाएं आम लोगों के लिए खुलती जाती हैं। एक ओर धर्म से दुनिया से परे ले जाने का कार्य तो सधता ही है, दुनिया में जीने के लिए भी साधन धर्म जुटाता है। यानी आध्यात्मिकता और भौतिकता दोनों का कार्य धर्म से सधता है। वाह! हांलाकि यही शब्द दुनिया में तमाम उठापटक का भी कारण हैं। धर्म जीवन-पद्धति है, कर्तव्य है। इससे परे कोई तीसरा अर्थ कम से कम मुझे समझ नहीं आता है। परहित सरिस धरम नहीं माई।/ पर पीड़ी सम नहीं अधमाई। तुलसीदास ने कितने सहज रूप में धर्म को व्याख्यायित कर दिया फिर भी दुनिया धर्म को लेकर लड़े जा रही है। दरअसल जो चीज जितनी सहज दिखती है उसे अपनाना उतना ही कठिन होता है। देखा वृंदावन का प्रताप। मेरे जैसे घुमक्कड़-फक्कड़ भी  दार्शनिक हो गया।

अभी बांके बिहारी जी के शाम के दर्शन में दो घंटे की प्रतीक्षा थी। तय किया कि मंदिर के प्रांगण में बैठकर ही शाम के 4:30 बजे की प्रतीक्षा की जाए। मंदिर के मुख्य द्वार के सामने ही बैठकर लोगों को देखने का आनंद लेने लगी। तभी याद आया कि लोगों के फोन और एसएमएस आ रहे थे। जिनका जवाब नहीं दे पा रही थी। अभी समय है चलो स्टेटस अपडेट कर दूं फेसबुक पर। ताकि लोगों को पता चल जाए कि मैं दिल्ली में नहीं हूं। कुछ फोटो फेसबुक पर डाल दी। अभी लंबा-चौड़ा लिखने का समय नहीं था तो दो-तीन फुटकर लाइनें लिख कर कुछ फोटो डाल दी। तब तक राधे-राधे करते भक्त मंडली मस्ती में झुमने लगे। सामूहिकता में कितना आनंद होता है। यह सुर और बेसुरा का प्रश्न नहीं था बस सामूहिकता की लय थी। और उसी में आनंद था। ढोल, नगाड़े वाले भी मस्त और अपन भी मस्त।सबसे खूबसूरत बात यह कि इतनी भीड़ इतनी मस्ती पर कहीं भी बेहूदगी नही देखी। गुलाल ही गुलाल, मस्ती ही मस्ती। राधा कृष्ण की नगरी जो है।
अभी एक घंटा रहता था कपाट खुलने में। बाहर भक्तों के घोष ऊंचे से ऊंचे होते जा रहे थे। बोल बांके बिहारी महाराज की जय। ऐसा लगा भक्तों की घोष ने बांके बिहारी जी भी स्थिर न रह सके और कपाट पहले ही खोल दिए गए।कपाट खुलते ही भक्तों का समुद्र भीतर बह चला- अंदर जैसे ही पहुंचे अद्भुत, अवर्णनीय दृश्य। लाल-गुलाबी गुलाल आसमान पर छाए हुए। सब बांके बिहारी के साथ होली खेलना चाह रहे थे। और बांके बिहारी जी की काले रंग की मूर्ति गुलाबी आभा से दमक रही थी। जीवन का सार, ध्येय, लक्ष्य आदि शब्द यहीं आकर समाप्त हो जा रहे थे। मोक्ष और क्या होता है। शायद यही.. यही.. यही..।  अपन तो आनंद से छक लिए। आने से पहले तो बहुत कुछ था मन में, पर अब मन में केवल आनंद! अपनी होली तो हो ली भई!!!
अब कुल्हड़ की चाय पी जाए और चाट खाई जाए अहा! चाय पीते-पीते फोने पर फेसबुक नोटीफिकेशन आने लगे,देखा की मेरी पोस्ट को  बहुत प्रतिक्रियाएं आ गयी हैं, कुछ ने  आश्चर्य जाहिर किया था तो कुछ ने शिकायत की थी कि मैं उन्हें नहीं लेकर गई। कुछ ऐसे थे जिन्होंने पढ़ा तो,कुछ कहना भी चाह होगा पर लाइक करके ही छोड़ दिया !
दरअसल यात्रा करना तो सब चाहते हैं पर यात्रा की चुनौती लेना सबके बस की बात नहीं। कुछ लोग यात्रा की इतनी प्लानिंग करते हैं कि वह यात्रा होती ही नहीं। मेरे लिए लाइफ हो या यात्रा बहुत ‘इफ’ और ‘बट’ नहीं है। बहुत सीधा और सहज सोचने वाली व्यक्ति हूं। इसलिए तमाम लोगों के ‘इफ’ और ‘बट’ की query से जूझने का माद्दा नहीं है मुझमें। उसमें यात्रा का आनंद ही समाप्त हो जाता है। यात्रा शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाती है।
अपन तो मन में आया, तो विचार बनाया, थोड़ा गूगल किया और निकल पड़े। इस उद्देश्य के साथ Lets Explore.............!

Asmi




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एम।फिल।(भाषा प्रौद्योगिकी) मेरी दृष्टि से भाषा मात्र मनुष्य के मनुष्य होने की पहचान और शर्त है। भाषा के बिना मनुष्य नहीं...