(अभी पिछले दिनों दिल्ली पत्रकार संघ द्वारा इंदिरा गांधी सांस्कृतिक कला केंद्र में पत्रकारों की सृजनात्मकता की अभिव्यक्ति के लिए एक आयोजन किया गया था I आयोजन के दौरान दिल्ली विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. अमरेन्द्र पांडे और महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के प्रकाश उपरेती ने मेरी पिछली पोस्ट ‘मुझे आजमाती है तेरी कमी’ की प्रशंसा करते हुए कहा - मैम यह कुछ अलग तरह का लेखन है। अपने ऐसे ही कुछ अनछुए पहलुओ को इन्हीं हाइवे यात्राओं के साथ जोड़ कर लिखे ।तो यह ख़ास विधा आप ही से शुरू हो I तो ये लेखन इन्हीं दोनों अनुजों के नाम, जिनकी प्रेरणा से अपनी डायरी के कुछ बंद पन्ने यहाँ साझा कर रही हूँ I डायरी मेरी है पर दूसरों के लिए भी अजनबी नहीं होगी )
आज फिर हाइवे की ओर कार मोड़ी। सिलसिला वही...... परीक्षा लेने का। कार जैसे –जैसे हाईवे की और मुडती है ,मुझे लगता है कि सांस में ताजगी सी आने लगती है ,दिल खामख्वा गुनगुनाने लगता है ,आँखे विस्मय से फ़ैल जाती हैं I शहर की भीड-भाड़ से जैसे ही हाइवे पर पहुंचती हूं तो अपने को और दूसरों को देखने का मौका मिल जाता है। यहां ट्रैफिक होता नहीं है तो कार भी मस्त चलती है और अपन भी। और ये वाला हाइवे तो बहुत सी यादें समेटे हैं। खिलखिलाते मौसम की, गीले मौसम की,धूप भरे मौसम की...सभी तो स्मृतियां हैं। एक-एक पड़ाव अच्छे से याद हैं। ढाबे,चाय की दुकान खेत,नहर। कितनी बार आती-जाती हूं। कभी स्पोर्ट्स कवरेज के लिए या परीक्षाओं के सिलसिले में।
एक-एक दृश्य कोई न कोई कहानी याद दिलाता जाता है । हां इन्हीं दिनों की तो बात है। शायद दस दिसंबर की। ऐसी ही गुनगुनी ठण्ड थी Iऔर शायद यही वह जगह थीजहाँ बैठकर ‘उसे’ पता चला कि मुझे जलेबी बहुत पसंद है। पुरबिया हूं न। स्वीट टूथ भी है। और यहीं उसने कार में ही चाय का घूँट पीते-पीते मुझसे अचानक कहा- तुम इतनी Independent क्यों हो? इतनी ज्यादा आत्मनिर्भर कि तुम्हारे नजदीक आना मुश्किल है । थोड़ा dependent हो जाना अच्छा होता है। जब कोई दूसरा तुम्हारे लिए काम करता है, तुम उस पर निर्भर करते हो। यह एक अच्छी सी फीलिंग होती है।
मैंने चाय पीते पीते ही उसका चेहरा देखने की कोशिश की। लेकिन कार में अंधेरा था। पर हाइवे पर आते-जाते ट्रकों की रौशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी। उसकी स्वप्निल आंखों में थोड़ी नाखुशी थी।
बात थोड़ी दार्शनिक सी थी पर मुझे बड़ी रोमांटिक लगी। वैसे रूमानियत के अवसर मैंने जिंदगी में बहुत कम आने दिए। मैं प्रकृति के सान्निध्य में ही रूमानियत अनुभव करती हूं। ये बात मेरे लिए थोड़ी अजीब थी और अचानक ही बिना किसी प्रसंग के उसने मुझसे कह दी या शायद मैं तैयार नहीं थी।
लड़की की पूरी लड़ाई ही इसी आत्मनिर्भरता को लेकर है कि वह अपने फैसले खुद ले सकेI मैंने अकेले फैसले लेना सीखा और यकीन मानिये कि अपने जीवन की मुश्किलों को झेलने में तो यह आत्मनिर्भरता काम आई ही ,दूसरे भी तमाम लोग मेरी इस आत्मनिर्भरता को देख अपने अपने जीवन में उठे और आगे बढे । सो ‘परनिर्भरता’ की बात थोड़ी अजीब थी फिर भी रोमानी लगी ।
मैंने चाय पीते पीते ही उसका चेहरा देखने की कोशिश की। लेकिन कार में अंधेरा था। पर हाइवे पर आते-जाते ट्रकों की रौशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी। उसकी स्वप्निल आंखों में थोड़ी नाखुशी थी।
बात थोड़ी दार्शनिक सी थी पर मुझे बड़ी रोमांटिक लगी। वैसे रूमानियत के अवसर मैंने जिंदगी में बहुत कम आने दिए। मैं प्रकृति के सान्निध्य में ही रूमानियत अनुभव करती हूं। ये बात मेरे लिए थोड़ी अजीब थी और अचानक ही बिना किसी प्रसंग के उसने मुझसे कह दी या शायद मैं तैयार नहीं थी।
लड़की की पूरी लड़ाई ही इसी आत्मनिर्भरता को लेकर है कि वह अपने फैसले खुद ले सकेI मैंने अकेले फैसले लेना सीखा और यकीन मानिये कि अपने जीवन की मुश्किलों को झेलने में तो यह आत्मनिर्भरता काम आई ही ,दूसरे भी तमाम लोग मेरी इस आत्मनिर्भरता को देख अपने अपने जीवन में उठे और आगे बढे । सो ‘परनिर्भरता’ की बात थोड़ी अजीब थी फिर भी रोमानी लगी ।
11-12 साल की उम्र से ही बॉस्केटबॉल की नेशनल चैंपियनशिप में भाग लेना शुरू हो गया था। दूसरे राज्यों की यात्रा करना आत्मनिर्भरता का पहला चरण था। मुझे याद है कि बचपन में मेरे बाल कमर तक लंबे थे। मां, बड़ी बहन या शशांक भाई मेरी चोटी करके स्कूल या स्टेडियम भेजते थे। जब पहली बार छठी क्लास में अकेले कलकता गई तो सात दिन तक उसी में चोटी में रही। बस ऊपर से कंघी कर लेती थी। वहां पहली बार अपने-आप शापिंग की और वह भी मां के लिए साड़ी। वापिस आकर जब मां को साड़ी दी तो पता नहीं कि मां हैरान ज्यादा था या खुश।पापा ने छोटी प्रकरण सुना तो बाल कटवा दिए I खेलों ने मुझे निर्भयता दी, आत्मनिर्भरता दी, ईमानदारी और सच्चाई दी। स्कूल से स्टेडियम जाना, वहां लड़कों के साथ अभ्यास करना,उनसे भिड़ जाना आम बात थी, फिर उनही के साथ आने-जाने से लड़के मेरे लिए भय का कारण नहीं रहे।
लेकिन फिर भी कुछ तो है जो मुझमें नहीं है.... शायद यही परनिर्भरता ,जो किसी के नज़दीक जाने से रोकती है । तो उसने जब मुझे कहा कि दूसरो पर निर्भर रहकर भी देखो तो मन थोड़ा नाजुक सा हो गया। वह पहला इंसान था जो मुझे परनिर्भरता सिखा रहा है। मन ने सोचा कि चलो यह भी आजमाए । और देखिये ..वक्त ने बड़ी जल्दी ही ऐसे मौके ला दिए जब परनिर्भरता आजमाने का अवसर आ गया। समय मेरे थोडा खिलाफ आ गयाI मैंने सहायता के लिए इधर देखा, उधर देखाI मिस्टर डिपेंडेबल को आवाज दी, पर वह आवाज लौटकर वापिस न आई। उचक कर नज़र दौडाई , पर दूर-दूर तक कोई आता न दिखा। ऐसा नहीं कि खिलाफ हवा में ही उसे ढूँढा, हवा मेरे साथ भी हुई,पर तब भी श्रीमान डिपेंडेबल न थे मेरे आसपास।
अरे! ये क्या किया मैंने परनिर्भरता को आजमाने में अपनी आत्मनिर्भरता से भी गई। अपन तो दोनों जहान से गए।
अरे! ये क्या किया मैंने परनिर्भरता को आजमाने में अपनी आत्मनिर्भरता से भी गई। अपन तो दोनों जहान से गए।
“न खुदा ही मिला न विसाले सनम/ न इधर के रहे न उधर के हम I”
हिन्दी के लेखक ‘फणीश्वरनाथ रेणु’ के ‘हीरामन’ ने तीसरी कसम खाई थी मैंने भी कसम खा डाली। तीसरी थी या पांचवी याद नहीं, पर कसम तो जरूर खाई I अब क्या खाई- ये फिर कभी.....अभी तो ड्राईवर बाबु कार खींचो जल्दी ... Viva लेने जाना है . सब इंतज़ार कर रहे होंगे .
हिन्दी के लेखक ‘फणीश्वरनाथ रेणु’ के ‘हीरामन’ ने तीसरी कसम खाई थी मैंने भी कसम खा डाली। तीसरी थी या पांचवी याद नहीं, पर कसम तो जरूर खाई I अब क्या खाई- ये फिर कभी.....अभी तो ड्राईवर बाबु कार खींचो जल्दी ... Viva लेने जाना है . सब इंतज़ार कर रहे होंगे .

